मुझमे थोड़ा मैं को रह जाने तो दो,
जो बिखर गया है उसको समेटने की मोहलत तो दो,
कुछ तुम ढूंढ लाओ कुछ मैं ढूंढ लाऊँ,
इस घर में एक ऐसा कोना रहने तो दो...
कुछ अनकही बातेँ,
कुछ तन्हाई की रातें,
कभी सिसकियों मे दबे ज़ज्बात,
तो कभी पास हो कर दूर होने का अह्सास,
In सबको एक बार सहलाने तो दो,
इस घर में एक ऐसा कोना रहने तो दो...
जहां मैं अपनी कहूँ और तुम सुन सको,
जहां तुम कहो और मैं समझ सकूँ,
पल भर को सही जहां अह्सास जिंदा रहे,
इस घर में एक ऐसा कोना रहने तो दो...
जहां ज़िंदगी खुली किताब हो,
होठों पे सच्ची सी मुस्कान हो,
रहे ना जज़्बातों पे कोई पर्दा,
इस घर में एक ऐसा कोना रहने तो दो...
कितना वक़्त गुजर गया जिम्मेदारियों मे,
हर ज़ज्बात दफन हो गए ख़ामोशियों मे,
कभी तुम्हारी मसरूफियत तो कभी मेरी बेबसी,
ले कर उड़ गए ज़िंदगी के हसीन लम्हें,
छुपा कर रख सकूँ जहां कुछ लम्हों को,
इस घर में एक ऐसा कोना रहने तो दो...
#SwetaBarnwal
2 comments:
Bahut hi acha lakhe hain.. Gulzaar type.. laga Gulzar shahab ki rachna padh raha hun.
samaj me apni ek alag pahchan banane vali stri apne hi ghar me apne liye ek kone ko talashti , 21vin sadi ek bahut badi hakikat hai ye...
very nice...
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