Showing posts with label कहानी संग्रह.... Show all posts
Showing posts with label कहानी संग्रह.... Show all posts

Tuesday, 3 December 2019

जरा चाय बना देना...

ए...! चाय बना देना,
ए..! खाना निकाल देना,
ए..! देखो बगल की चाची आई है, प्रणाम करो,
ए..! दरवाजे के सामने ऐसे क्यूँ खड़ी हो,
बस कुछ इन्हीं शब्दों का आदि हो चुके थे आशा के कान और वो यही सोचती, "क्या सबकी सासु माँ ऐसे ही बात करती हैं"
आशा एक पाढ़ी लिखी और समझदार लड़की थी जो अभी अभी तो मायके से ससुराल तक का सफ़र तय कर आई थी दिल में कई अरमान लिए. बड़े जतन से सबका मान रखती. पर सास का "ए" से संबोधन उसे बहुत खलता, क्या जाता अगर सासु माँ उसे बेटी, बहु या फिर उसके नाम से ही बुला लेती .
फ़िर एक दिन,
ए...! जरा चाय बना देना,
आशा ने सास की बात को अनसुना कर अपने काम मे लगी रही, शाम को पति के घर आते ही सास ने उसकी शिकायत की. आशा भोली और अंजान बनी रही. सास ने अपने वाक्य दुहराया कि शाम को उन्होंने आशा को कहा था कि
"ए...! जरा चाय बना देना"
पर वो अनसुना करके चली गई, तभी आशा ने तुरंत कहा कि यहां "ए" कौन है...?
उसके पति को तुरंत उसकी बात समझ आ गई और उन्हों अपनी माँ को समझाया कि वो आशा को उसके नाम या बेटी या बहु से बुलाया करे ना कि "ए" कह कर, आखिर वो भी तो उसकी बेटी जैसी ही है. सासु माँ को जैसे ही बात समझ आई, उन्हों ने आवाज लगाई...
"बेटी आशा..! जरा चाय बना देना..."
और ये सुन सब खिलखिला कर हंसने लगे...

#SwetaBarnwal 

Saturday, 30 November 2019

मेरा दामाद लाखों मे एक...

नई नवेली दुल्हन आशा अपने दिल में कई सारे अरमान लिए अपने पति संग ससुराल की दहलीज पे पांव रखी. ससुराल में सास, ससुर, ननद और देवर और खुब प्यार करने वाले पति, बस एक प्यारा सा परिवार. पति पत्नी दोनों ही प्राइवेट फर्म मे काम करते थे. सुबह उठते ही घर के कामों को जल्दी जल्दी निपटा कर सभी के नाश्ते और खाने का प्रबंध कर पति के साथ दफ्तर के लिए निकल जाती. पूरे दिन के भाग दौड़ के बाद आशा काफी थक सी जाती थी. घर आने के बाद किसी और काम की हिम्मत नहीं बचती थी उसमें. बावजूद घर में सबका ख्याल रखती थी. घर के कामों में सिवाय उसके पति राजेश के किसी और ने ना उसकी मदद करनी चाही और ना ही आशा ने किसी से कभी कुछ कहा.
अपने माँ पापा की लाडली और पढ़ाई मे व्यस्त रहने के कारण घर के कामों में कोई खास रुचि नहीं थी उसकी और ना ही कोई भार था उसपे. और यहां ससुराल आते ही घर की सारी जिम्मेवारी उसके सर आ गई. सास को अपने वो फूटी आंख ना सुहाती, वज़ह उनके बेटे राजेश का रसोई और घर के अन्य कामों में आशा का हाथ बटाना. आशा खुद एक working lady होने की वज़ह से कई बार चाहा कि घर में कोई maid रख ले, पर सास ससुर ने इसकी अनुमति नहीं दी. राजेश को भी अपनी माँ की खरी खोटी सुननी पड़ती थी. अपनी माँ का दुलारा बेटा आज नाकारा बेटा साबित हो रहा था. धीरे धीरे घर का माहौल बिगड़ने लगा. आशा के सारे सपनों पे जैसे पानी फिर गया. अचानक घर में एक नई खुशी का आगमन हुआ. आशा माँ बनने वाली थी, सारे बहुत खुश थे. लेकिन इस खुशी के साथ कई परेशानियां भी साथ आ गई. आशा के स्वास्थ्य पे असर पड़ने लगा. सबकी खुशी देख आशा ने एक बार फिर अपनी बात सबके सामने रखी कि घर में एक maid रख ली जाए. मगर इस बार भी वही हुआ, उसकी बात को सास ने मानने से इंकार कर दिया. आशा ने किसी तरह से ये दिन भी गुज़ार लिए.
फिर वो दिन आ गया जिस दिन का सबको बेसब्री से इंतजार था. आशा बहुत जि़द करके अपने मायके चली गई और वहां उसने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया. यहां वो पुरसुकुन से रह रही थी, मगर कितने दिन. आख़िर वो दिन भी आ गया जब उसे ससुराल जाना था. मायके में तो माँ पापा ने उसे सर पर बिठा रखा था. मगर ससुराल जाते ही फिर से वही भाग दौड़ की जिंदगी.
दिन गुज़रते गए और एक दिन उसकी ननद ब्याह कर अपने ससुराल चली गई. सभी बहुत खुश थे. दिन जैसे पंख लगा कर उड़ रहे थे. आशा का बेटा अब 1 साल को होने को था. उसके पहले जन्मदिन पर ननद अपने मायके आई. आशा की सासु माँ की ख़ुशी का ठिकाना ना था. आख़िर ख़ुश क्यूँ ना होती, उनके दामाद ने घर में दो maid रख दिया था, घर के छोटे मोटे कामों में हाथ बंटाते, हर weekend पे outing पे ले जाते, साथ वक्त बिताते, उसकी हर ख्वाहिश पूरी करते, उनकी बेटी को उसकी सासु माँ ने पलकों पर बिठाया था.
आशा की सासु माँ अपने पड़ोसियों से ये कहते नहीं थक रही थी आज
"मेरा दामाद लाखों मे एक..."
और आशा अपने आंचल से आँखों को पोंछ बेटे के जन्मदिन की तैयारी में लग गई...


*जिस मापदंड पे दामाद लाखों मे एक हो गया आख़िर उसी मापदंड पे बेटा नाकारा कैसे हो गया. ये दोहरा मापदंड आख़िर क्यूँ... 😢
आख़िर बहु और बेटी मे ऐसा फर्क़ क्यूँ... 🙁
#SwetaBarnwal 

Sunday, 7 July 2019

अब मैं अपने अंदाज़ में जीने लगी हूँ...

ऐसा नहीं था कि मैं उससे प्यार नहीं करती थी और ऐसा भी नहीं था कि मैं उसके बिना जी नहीं सकती. शादी के २५ सालों के दौरान हमारा रिश्ता ठंढे बस्ते में चला गया था. बीतते वक़्त के साथ हम एक दूसरे की मोहब्बत तो नहीं, हाँ शायद आदत बन कर रह गए थे. हम दोनों को ही एक दूसरे के जज़्बातों की परवाह नहीं रह गई थी. उसने कभी मेरी जिम्मेदारियों का बोझ नहीं उठाया और ना ही मैं कभी उस पर बोझ बन कर रहना चाहती थी. हाँ, उन्हें हमारे बच्चों से बहुत प्यार था, शायद यही एक वजह थी जो हमारे वैवाहिक रिश्ते को इतने सालों तक ढोते रही और हमे एक सूत्र में बांधे रखा.
चरित्र मे उसके कोई खोट ना था पर अपनी पत्नी यानि की मुझपर विश्वास रत्ती भर भी ना था. बहुत चाहा मैंने कि उसका ये मुझ पर अविश्वास ख़त्म हो जाए पर वक़्त के साथ ये परवान चढ़ता गया. उसमें शायद कोई ऐसी बुराई नहीं थी जो हमारे रिश्ते में आ रहे दरार की वजह बनती है पर उसका अविश्वास, अनर्गल आरोप, हर बात पर मेरे चरित्र का हनन इन सब ने मिल कर हमारे रिश्ते को निगल लिया. उसने ख्वाब में भी कभी मेरा ऐतबार नहीं किया. वो अपने स्त्री पुरुष हर तरह के दोस्त और सहकर्मियों का ज़िक्र किया करता था मुझसे. इस तरह वो अपनी ईमानदारी का सबूत दिया करता था. पर कभी भूले से भी मेरे मुह से किसी पुरुष मित्र या सहकर्मी का नाम निकल जाए तो शक़ की घंटी तुरंत उसके दिमाग में बजने लगती थी. वैसे इसमे उसकी कोई गलती नहीं थी. गलती तो इस समाज और उसके घटिया सोच की है जो पहले तो औरतों को घर की दहलीज़ पार करने नहीं देती थी और आज जब औरतों ने दुनिया में अपना मकाम बना लिया है तब भी उसके पैरों मे अनजानी सी बेड़ियाँ हर वक़्त रहती है बंधी. बची खुची कसर उन्हें मिली परवरिश ने पूरी कर दी. उसके माँ बाप ने कभी मुझे बहु का मान नहीं दिया, हर वक़्त अपनी जली कटी और अश्लील शब्दों से मेरे किरदार और चरित्र का हनन करते.
इस रिश्ते में घुटन सी होने लगी थी, पर कुछ था जो शायद अब भी शेष था हमारे बीच और वो था सबकुछ ठीक होने की उम्मीद. मेरी इन झंझावतों से भरी ज़िंदगी में ऐसा नहीं था कि मुझे कोई चाहने वाला ना मिला था, पर मुझे अपनी हदें मालूम थी और ये भी समझती थी कि हर मर्द एक जैसे ही होते हैं. औरत सबके लिए सिर्फ़ मन बहलाने का जरिया मात्र है. पर हाँ इस मतलबी दुनिया में कुछ बहुत अच्छे दोस्त भी मिले थे जिसने मुझे जीना सिखाया, ख़ुद से लड़ना सिखाया, अपने अंदर के तूफानों को दबाना सिखाया. नहीं नहीं इन दोस्तों के बारे में मैंने उसे कभी कुछ नहीं बताया. अतीत में किए गए ईमानदारी के परिणाम देख अब उसे दुहराने की गलती क्यूँ करती भला. मैंने कभी कुछ ना छुपाया, जो भी था अतीत मेरा, भला या बुरा हर किस्सा सुनाया बदले में सिवाय गाली के कुछ ना मिला. हर वक़्त मेरा मोबाइल खंगालना, मैसेज देखना, छोटी छोटी बातों पर हंगामा करना, मेरी इज़्ज़त को तार तार करना, इसलिए निकाल फेंका अपने अंदर के ईमानदारी के किड़े को.
सच कहूँ तो मुझे मेरे अस्तित्व की पहचान मेरे उन्हीं दोस्तों ने कराई. मेरे अंदर मृत पड़े एहसास को उनलोगों ने ही जगाया. मैं अब अपने आप को संवारने लगी, अपने तरीकों और शौख को बदलने लगी अब मैं ख़ुद के लिए भी जीने लगी और वो कहते हैं तुम्हारे तो कई यार हैं, कई चाहने वाले हैं, तुम्हें मेरी क्या जरूरत. तुम्हारी तो हर रात रंगीन होती होगी और मैं मुस्कुरा कर सहमति मे हाँ बोल जाती हूँ सिर्फ़ इसलिए कि अब मैं अपने अंदाज़ में जीने लगी हूँ. कब तक सफ़ाई देती रहूँ अनकहे इल्ज़ामों का कि अब मैं हर ज़हर पीने लगी हूँ...

क्या इस स्त्री ने सही किया, अपना जवाब comment box मे जरुर दें...

(एक स्त्री के वर्चस्व की लड़ाई)

#SwetaBarnwal 

Saturday, 10 March 2018

एक सीख

धम्म 

(एक लघु कथा) 


धम्म...! 
कड़ाके की सर्दी थी, अचानक आधी रात को अपार्टमेंट में सो रहे लोगों की नींद इस आवाज़ से खुली। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि आख़िर ये आवाज़ कैसी थी, पर किसी अनिष्ट की आशंका से सभी सहमे से थे। सब बेहवास से दौड़े, कोई बालकनी की तरफ़ तो कोई अपार्टमेंट के नीचे की ओर भागा। कोई आँखें मीच रहा था तो कोई अपने कपड़े को ठीक कर रहा था।
अपार्टमेंट के नीचे अचानक अफरातफरी मच गई, चौकीदार ने सबको आवाज़ लगाई। पांचवें माले के शर्मा जी के बेटे शान्तनु ने छत से छलांग मार दी। काफ़ी लोग जमा हो चुके थे, सब के चेहरे पर भाव आ जा रहे थे। सवाल कई थे, पर जवाब किसी के पास नहीं था। शांतनु के माता-पिता दोनों को काटो तो खून नहीं। उनकी गोद में अब उनके बेटे की जगह खून से लथपथ मांस का लोथड़ा शेष था। शांतनु के प्राण पखेरू उड़ चुके थे। माता-पिता ने अपनी इकलोती संतान खो दी थी।
जैसे तैसे कर सबको संभाला गया। पुलिस और ambulance आ चुकी थी। शान्तनु के पार्थिव शरीर को पोस्टमार्टम के लिए ले जाना था। पुलिस शर्मा जी से शान्तनु के आत्महत्या से संबंधित कुछ सवाल करने लगी और इस के बाद जो सच्चाई सामने आई वो यकीनन दिल दहला देने वाली थी।
शान्तनु एक औसत विद्यार्थी था। जैसे-जैसे उस के बोर्ड की परीक्षा का समय नज़दीक आ रहा था उसपर उसकी माँ का दबाव बढ़ रहा था। शान्तनु को sports मे रुचि थी, जबकि उसकी माँ उसे फाइटर पायलट बनाना चाहती थी। इसके लिए माँ ने कई ट्यूशन लगवा दिए थे, घर में भी पूरा वक़्त पढ़ाई का दबाव था। उसके बाहर आने-जाने, दोस्तों से मिलने, खेलने, दूरदर्शन, दूरभाष आदि सब पर पाबंदी थी। दिन प्रतिदिन शान्तनु मुरझाता जा रहा था। शायद आज उस के सब्र का बांध टूट गया था। पुलिस ने ध्यान दिया तो पाया कि शान्तनु के हाथ में एक कागज का टुकड़ा था जो पूरी तरह से खून से सन चुका था। पुलिस ने उसे निकाल कर पढ़ा तो सब स्तब्ध रह गए। उसमे लिखा था ;
I am sorry माँ, 
मैं आपका लायक बेटा नहीं हूँ। 
मुझमे आपके सपनों को पूरा करने की काबिलियत नहीं है। 
मुझे माफ़ कर देना। 
I love you so much माँ-पापा...
सबकी आँखें छलछला उठी थी। शान्तनु की माँ तो जैसे निर्जीव हो चुकी थी। वो ज़िंदा तो थी, पर शायद ज़िन्दगी शेष ना थी।


#SwetaBarnwal 



Friday, 9 March 2018

एक अनोखी प्रेम कहानी...

७० साल का बुड्ढा और ६५ साल की बुढ़िया 

(एक अनोखी प्रेम कहानी) 




७० वर्षीय खन्ना साहब अपनी गाड़ी से मंदिर से लौट रहे थे कि रास्ते मे एक पेड़ के नीचे एक औरत अकेली बैठी दिखी। गाड़ी रोक वो उनके पास गए पूछा क्या बात है आप थोड़ी परेशान लग रही हैं, मैं कुछ मदद कर सकता हूँ। वो फुट-फुट कर रोने लगी। उन्होंने अपना नाम सुशीला बताया साथ ही ये भी बताया कि उनके एकलौते बेटे बहु ने उनकी सारी संपत्ति अपने नाम कर उन्हें घर से बाहर कर दिया था। खन्ना साहब ने उन्हें ढांढस बंधाया और उन्हें अपने साथ अपने घर ले गए जहां वे खुद भी अकेले रहते थे। 

खन्ना साहब काफी सुलझे हुए और तजुर्बेकार इंसान थे। उनके कुछ दिनों की मेहनत और समझाने के बाद सुशीला देवी ने अपने बेटे बहु के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज़ कराया। उनके बेटे बहु को इसकी तनिक भी उम्मीद ना थी। खन्ना साहब का साथ और सुशीला देवी की हिम्मत रंग लाई और वो मुकदमा जीत गई। उन्हें उनका घर, बेटे से मासिक भत्ता और मुआवजे की कुछ राशि मिली जो उनके शेष ज़िंदगी के लिए पर्याप्त था।

बातों बातों में सुशीला देवी जान गई थी कि खन्ना साहब भी अपने बच्चों के हाथों सताए हुए हैं। खन्ना साहब ने एक वृद्धाश्रम भी खोल रखा था जिसमें वो हर मजबूर, बेबस और अपनों के सताए हुए बुजुर्गों को पनाह देते थे और उनकी हर संभव मदद करते थे। खन्ना साहब और सुशीला देवी दोनों  ही तन्हाई के साथी थे। दोनों एक दूसरे की काफ़ी कद्र करते थे। 

एक दिन खन्ना साहब ने कहा कि क्या आप मुझसे शादी करेंगी। सुशीला देवी को पहले तो ये एक मज़ाक लगा पर फ़िर खन्ना साहब के भाव भंगिमा को देख वो झेंप गई। उन्होंने कहा कि इस उम्र में शादी, लोग, दुनिया, समाज ये सब क्या कहेंगे? खन्ना साहब ने कहा जब हम अपनों के जुल्मों का शिकार हुए थे, तब कहाँ थे ये सब। जब उस वक़्त सारे चुप थे तो फ़िर आज हम क्यूँ सुने उनकी? और वैसे भी एक ७० साल का बुड्ढा और एक ६५ साल की बुढ़िया क्या कर रहे हैं, इससे लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता। ये सुन कर सुशीला देवी शर्मा उठी और अपनी स्वीकृति दे दी और दोनों ही एक नई दुनिया की सैर पे निकल पड़े।


#SwetaBarnwal 

Thursday, 8 March 2018

भोलवा...

(एक कथा) 


भोलवा अरे भोलवा कहाँ मर गया तू...! 
भोलवा, जब से होश संभाला था सब इसी नाम से बुलाते थे उसे। कौन था वो, कहाँ से आया था, उसके मां-बाप कौन थे, कोई नहीं जानता था। भोलवा ने भी इस गाँव को ही अपना घर और यहां के लोगों को अपना परिवार मान लिया था। जब जिसे काम होता वो भोलवा को आवाज़ लगाता और वो भी बड़े अपनाइयत से सबके काम कर देता। बदले में उसे सबसे मेहनताने के तौर पर कुछ ना कुछ मिल जाता था, जिससे उसके अकेले की ज़िन्दगी मजे मे गुज़र रही थी।

वो भी जवानी की दहलीज पर कदम रख रहा था, उसके अरमानों को भी पंख लग रहे थे। बड़ी ख्वाहिश थी उसकी कि, उसका भी कोई अपना हो, घर हो, परिवार हो। पर अगले ही पल वो अपने ख्यालों को झटक देता। उसे लगता था कि उसे सपने देखने का कोई हक़ नहीं। अब तक की ज़िन्दगी उसकी गाँव के चौपाल पर ही कटी थी। एक दिन उसने गाँव के बाहर खाली पड़ी एक ज़मीन पर अपनी छोटी सी झोपड़ी बना ली। शायद ये उसके सपनों की पहली उड़ान थी, जिसमे उसने रंग भरने शुरू कर दिए थे। 

एक दिन गाँव के बच्चों को विद्यालय, जो कि गाँव से दूर था, पहुंचा कर लौट रहा था। अचानक उसने देखा कि एक पागल सी लड़की को कुछ लड़के अपने उन्माद और शराब के नशे में छेड़ रहे थे। उस लड़की के अंगवस्त्र फटे हुए थे। वो साधारण सी दिखने वाली एक पागल लड़की मे पता नहीं उन लड़कों को क्या नज़र आया कि वे अपनी हवस की भूख मिटाने उसे नोचने लगे। भोलवा ने एक क्षण भी गंवाए बिना उन लड़कों की जम के धुलाई की। लड़की बिलकुल सहम सी गई थी। भोलवा को देखते ही वो उसे लिपट कर फुट-फुट कर रोने लगी। शायद ज़िन्दगी में पहली बार कोई फरिश्ता मिला उसे, वरना इससे पहले सबने उस पर गंदी नज़र ही डाली थी।

भोलवा उसे अपने साथ अपनी झोपड़ी ले आया। उसका ख़्याल रखा, उसे संभाला, दिलासा दिलाया उसकी सुरक्षा का। धीरे-धीरे वो सामान्य होने लगी। उसे अपना नाम और परिवार तो याद नहीं था पर लोग उसे फुलवा नाम से बुलाते थे। फुलवा भी एक अनाथ थी उसे भोलवा के रुप मे एक सच्चा रहबर मिला। पर ये जालिम दुनिया जो एक जवान लड़के और लड़की के साथ को ग़लत नज़र से देखती है। ऐसा ही कुछ भोलवा के साथ हुआ। गाँव वाले उस पर दबाव बनाने लगे कि उस लड़की को घर से बाहर निकालो। ना जाने किस किस घाट का पानी पिया होगा उसने। हमारी बेटियों पर ग़लत प्रभाव पड़ सकता है इसका। भोलवा समझ नहीं पाते रहा था कि आख़िर इसमे फुलवा की क्या गलती जो लोग उसके साथ अभद्रता कर रहे हैं।

पूरी रात भोलवा यूँ ही बैठा, सोंचता रहा। फुलवा से उसकी परेशानी देखी नहीं गई। वो उसके पास आई और कहने लगी, तुमने मेरी बड़ी मदद की, तुम एक नेक दिल इंसान हो, मेरी वजह से अपनी ज़िन्दगी मत बर्बाद करो। मैं रात के अंधेरे में ग़ायब हो जाती हूँ। कल से सब ठीक हो जाएगा। ये कह वो जाने लगी। भोलवा ने उसका हाथ पकड़ा और बोला गर तुम मुझे ग़लत ना समझो तो एक बात पूछूं। फुलवा ने स्वीकृति मे सर हिलाया।
"क्या तुम मेरी जीवनसंगनी बनोगी" और भोल्वा ने उसके सामने हाथ जोड़ लिए। इसे तुम मेरी हमदर्दी या कोई मजबूरी ना समझना। बस तुम्हारी मासूमियत मेरे दिल को छू गई। फुलवा को तो जैसे बिन मांगे मुराद मिल गई।
वो लिपट कर भोलवा से आज खुब रोना चाहती थी। उसने आज एक खुलासा किया कि वो कोई पागल नहीं है बल्कि इस जालिम दुनिया से ख़ुद को और अपनी अस्मिता को बचाए रखने की एक कोशिश थी।

अगले दिन दोनों ने मंदिर में जा कर साधारण तरीके से शादी कर ली। अब तो गाँव वालों को भी कोई दिक्कत नहीं थी। अपितु सबने भोलवा की शादी में खुब मजे किए और सबने वर-वधु को ढेर सारी शुभकामनाएं दीं। सारे गाँव वालों ने मिलकर घर के आवश्यक सामनों को भी इकट्ठा किया और एक नव दंपत्ति की पूरे जोश के साथ स्वागत किया। इस तरह से एक प्यारा रिश्ता अपने अंज़ाम को पहुंचता है....



#SwetaBarnwal 

Tuesday, 20 February 2018

ये मासूमियत 


सुबह प्रातः काल उठ कर पढ़ना अक्सर लोगों को भाता नहीं. मेरी भी आदत कुछ ऐसी ही थी. सारी रात जाग कर कितना भी पढ़ लूँ, पर सुबह उठने के नाम से नानी याद आती थी. वैसे ये आदत आज भी नहीं गई है. खैर ये उस समय की बात है जब हम नौवीं कक्षा मे थे. पिताजी हमारे सुबह के चार बजे रोजाना उठ कर बागवानी और योगा किया करते थे. रोज हमे और हमारी को भी वो ५ :00 बजे सुबह उठा दिया करते थे पढ़ने को. बहुत गुस्सा भी आता था और खीज भी होती थी. समझते थे कि वो जो कर रहे हैं, हमारी भलाई के लिए कर रहे हैं. पर क्या करें निन्द्रा देवी की हम पर असीम कृपा थी.
हमारा घर दोतल्ला हुआ करता था. एक दिन हमने कहा पिताजी हम ऊपर वाले कमरे में सोएंगे. पिताजी ने कहा कि फ़िर सुबह कैसे उठोगी तुम लोग. हम दोनों बहनों ने साथ मे कहा कि "अलार्म से". पिताजी को यकीन तो नहीं था, फिर भी हमे जाने दिया. उस वक़्त हमारे गाँवों में बिजली की बड़ी विकट स्थिति थी, वो आती कम और जाती  ज्यादा थी. इसलिए हम साथ मे लालटेन भी ले गए ऊपर कमरे में. उस दिन हमने पक्का मन बनाया कि सुबह उठकर पढ़ाई करेंगे और पिताजी को निराश नहीं होने देंगे.
ख़ैर रात को हम दृढ़ संकल्प हो, अलार्म लगा लालटेन की रोशनी को मध्यम कर दोनों बिस्तर के पास की ही कुर्सी पर रख सोने चले गए. आख़िर हमारी नींद खुली अलार्म से और हम दोनों बहनों ने अर्द्ध निन्द्रा मे ही हाथ बढ़ाया अलार्म को बंद करने के लिए.
पर हमारी बेवकूफी कहिए या नींद का आलम की हम दोनों ने ही अलार्म बंद करने के लिए लालटेन की  क्नाॅब (knob) को घुमाना शुरू कर दिया. नींद मे इतनी बेखबरी और मदहोशी थी कि हमे ये भी ख़्याल ना आया कि अलार्म बंद करने के लिए लालटेन की knob नहीं घड़ी की स्विच प्रेस करनी थी. इसी बेख्याली मे हमने लालटेन ऑफ़ कर दिया पर वो अलार्म बंद ना हुआ. अंततः हम दोनों बहनें कान पे तकिया रख सो गए. हमे समझ ही नहीं आया कि आख़िर वो अलार्म बंद क्यूँ नहीं हुआ. ख़ैर बाद में हमे बहुत डांट पड़ी माँ पिताजी से हमारी कुंभकरणी निन्द्रा के लिए...
आज भी हम उस रात को याद करते हैं तो हमारी हंसी नहीं रुकती ये सोच-सोच कर कि सच में कैसी नींद थी हमारी...

#SwetaBarnwal 

Monday, 19 February 2018

वो गज़रे वाली 



आज एक अजीब सी बात हुई...
रेड लाइट पे जैसे ही हमारी बाइक रुकी एक छोटी सी बच्ची हाथों मे गज़रा लिए हमारे समीप आई और मेरे पति महोदय #अमित से कहने लगी, बाबूजी ये गजरा ले लो ना, मैडम पर बहुत जचेगी. मुझे गजरे लगाने का कोई शौख ना था, सो मैंने मना कर दिया और कहा कि ये सब फीज़ुल खर्ची है. तभी सिग्नल ग्रीन होते ही हमारी बाइक आगे निकल गई. लेकिन ना जाने क्यूँ मन बेचैन हो गया था, लग रहा था जैसे पीछे कुछ छूट गया हो. ख़ैर हमे मंदिर जाना था, सो हम मंदिर पहुंच गए. हमने फूल-माला, प्रसाद लिया, मंदिर के अंदर गए, दर्शन किए सोचा अब मन शांत हो जाएगा. पर कुछ खास फर्क नहीं पड़ा. मंदिर में पूजा-आरती के बाद अमित जी ने मेरे हाथ में १०१/ रु. दिए और कहा #नीलम ये दान पेटी में डाल दो. अचानक मेरे मन के भीतर कुछ टूट सा गया जैसे. उस वक़्त तो मैंने कुछ ना कहा, पैसे दानपेटी मे डाला और प्रणाम कर मंदिर से बाहर आ गई...

मेरे मन के भीतर का कोलाहल कुछ ज्यादा ही बढ़ चुका था अब. कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था.  मैंने अमित से कहा घर चलो, तबयत कुछ ठीक नहीं लग रही. उन्होंने कई बार जानने की कोशिश की, पूछा क्या हुआ नीलम. पर बताती क्या मैं उन्हें. वजह तो मुझे खुद भी मालूम नहीं था. आख़िर हम घर की ओर चल दिए. वापसी मे फ़िर हमारी बाइक रेड लाइट पे रुकी. मेरी नज़र इधर-उधर दौड़ने लगी, शायद किसी को ढूंढ रही थी. पर किसे, पता नहीं. अचानक मुझे वो गज़रे वाली लड़की नज़र आई. मैंने अमित को कहा बाइक किनारे लगाने को और चली गई उस लड़की के पास. अमित ने आवाज़ भी लगाई, क्या हुआ नीलम रूको भी. पर मुझ से रुका नहीं गया.

मैंने पीछे से उस लड़की के कंधे पर हाथ रखा वो घबरा कर मेरी ओर मुड़ी और मुस्कुरा कर बोली, मैडम आप. मेरे पूछने पर उसने अपना नाम #सुरभि बताया. मैंने कहा, सारे गज़रे बिक गए. उसके चेहरे पर चिंता के भाव उभर आए, कहा नहीं
मैडम..! आज तो एक भी गज़रा नहीं बिका. फ़िर वो अपने बारे में कहती चली गई और मैं वहीं खड़ी धूप में सुनती रही. घर में दो छोटे भाई बहनों को छोड़ उनकी रोटी का इंतज़ाम करने सुबह से ही निकली थी वो घर से. मन बहुत व्यथित हुआ ये सुनकर.मैंने पूछा कितने गज़रे हैं तेरे पास और कितना लोगी सारे गज़रे का? पहले तो वो हंसी, फिर बोली, क्या करोगी मैडम आप इतने गज़रों का, आपको तो शौख भी नहीं है. उसकी ये बातें सही मे मुझे विचलित कर गई. उसने पूरे गज़रे के २५०/ रु बताए. मैंने उससे सारे गज़रे लिए और उसे ५०० पकड़ाए, कहा रख लो और मेरी ओर से कुछ ले लेना अपने भाई-बहनों के लिए. पर उसने २५०/ रु रखे और शेष मुझे लौटा दिया. सुरभि ने कहा, मैडम आपने बिना जरूरत के मेरे गज़रों को ले लिया मेरे लिए तो यही बहूत है. आज तो मुझे रोज से ज्यादा पैसे भी मिले और दो घंटे मे ही घर लौट जाऊंगी. इतना कह वो मुस्कुराती हुई चली गई और मेरी नज़रें दूर तक उसे देखती रही. ओझल होने से पहले उसने मुझे पलट कर देखा और मुस्कुरा दिया.

इस वक़्त मेरा मन पूरी तरह शांत हो चुका था और मैं असीम खुशी भी महसूस कर रही थी. अमित दूर खड़े सब देख और सून रहे थे. पास आते ही कहा, मैडम अब तो तबयत ठीक हो गई ना. मैं खिलखिला उठी. वो सारे गज़रे ले कर हम घर के पास के ही मंदिर मे चढ़ा आए और उनमे से एक गज़रा अमित ने मेरे बालों में लगा दिया. मेरा रोम-रोम खिल उठा.

अक्सर ज़िन्दगी की खुशियाँ इन छोटे-छोटे पलों में होती है और हम तलाशते कहीं और हैं...

#SwetaBarnwal 

ऐ विधाता...!

 ऐ विधाता...! ना जाने तू कैसे खेल खिलाता है...  किसी पे अपना सारा प्यार लुटाते हो, और किसी को जीवन भर तरसाते हो,  कोई लाखों की किस्मत का माल...