Monday, 19 February 2018

वो गज़रे वाली 



आज एक अजीब सी बात हुई...
रेड लाइट पे जैसे ही हमारी बाइक रुकी एक छोटी सी बच्ची हाथों मे गज़रा लिए हमारे समीप आई और मेरे पति महोदय #अमित से कहने लगी, बाबूजी ये गजरा ले लो ना, मैडम पर बहुत जचेगी. मुझे गजरे लगाने का कोई शौख ना था, सो मैंने मना कर दिया और कहा कि ये सब फीज़ुल खर्ची है. तभी सिग्नल ग्रीन होते ही हमारी बाइक आगे निकल गई. लेकिन ना जाने क्यूँ मन बेचैन हो गया था, लग रहा था जैसे पीछे कुछ छूट गया हो. ख़ैर हमे मंदिर जाना था, सो हम मंदिर पहुंच गए. हमने फूल-माला, प्रसाद लिया, मंदिर के अंदर गए, दर्शन किए सोचा अब मन शांत हो जाएगा. पर कुछ खास फर्क नहीं पड़ा. मंदिर में पूजा-आरती के बाद अमित जी ने मेरे हाथ में १०१/ रु. दिए और कहा #नीलम ये दान पेटी में डाल दो. अचानक मेरे मन के भीतर कुछ टूट सा गया जैसे. उस वक़्त तो मैंने कुछ ना कहा, पैसे दानपेटी मे डाला और प्रणाम कर मंदिर से बाहर आ गई...

मेरे मन के भीतर का कोलाहल कुछ ज्यादा ही बढ़ चुका था अब. कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था.  मैंने अमित से कहा घर चलो, तबयत कुछ ठीक नहीं लग रही. उन्होंने कई बार जानने की कोशिश की, पूछा क्या हुआ नीलम. पर बताती क्या मैं उन्हें. वजह तो मुझे खुद भी मालूम नहीं था. आख़िर हम घर की ओर चल दिए. वापसी मे फ़िर हमारी बाइक रेड लाइट पे रुकी. मेरी नज़र इधर-उधर दौड़ने लगी, शायद किसी को ढूंढ रही थी. पर किसे, पता नहीं. अचानक मुझे वो गज़रे वाली लड़की नज़र आई. मैंने अमित को कहा बाइक किनारे लगाने को और चली गई उस लड़की के पास. अमित ने आवाज़ भी लगाई, क्या हुआ नीलम रूको भी. पर मुझ से रुका नहीं गया.

मैंने पीछे से उस लड़की के कंधे पर हाथ रखा वो घबरा कर मेरी ओर मुड़ी और मुस्कुरा कर बोली, मैडम आप. मेरे पूछने पर उसने अपना नाम #सुरभि बताया. मैंने कहा, सारे गज़रे बिक गए. उसके चेहरे पर चिंता के भाव उभर आए, कहा नहीं
मैडम..! आज तो एक भी गज़रा नहीं बिका. फ़िर वो अपने बारे में कहती चली गई और मैं वहीं खड़ी धूप में सुनती रही. घर में दो छोटे भाई बहनों को छोड़ उनकी रोटी का इंतज़ाम करने सुबह से ही निकली थी वो घर से. मन बहुत व्यथित हुआ ये सुनकर.मैंने पूछा कितने गज़रे हैं तेरे पास और कितना लोगी सारे गज़रे का? पहले तो वो हंसी, फिर बोली, क्या करोगी मैडम आप इतने गज़रों का, आपको तो शौख भी नहीं है. उसकी ये बातें सही मे मुझे विचलित कर गई. उसने पूरे गज़रे के २५०/ रु बताए. मैंने उससे सारे गज़रे लिए और उसे ५०० पकड़ाए, कहा रख लो और मेरी ओर से कुछ ले लेना अपने भाई-बहनों के लिए. पर उसने २५०/ रु रखे और शेष मुझे लौटा दिया. सुरभि ने कहा, मैडम आपने बिना जरूरत के मेरे गज़रों को ले लिया मेरे लिए तो यही बहूत है. आज तो मुझे रोज से ज्यादा पैसे भी मिले और दो घंटे मे ही घर लौट जाऊंगी. इतना कह वो मुस्कुराती हुई चली गई और मेरी नज़रें दूर तक उसे देखती रही. ओझल होने से पहले उसने मुझे पलट कर देखा और मुस्कुरा दिया.

इस वक़्त मेरा मन पूरी तरह शांत हो चुका था और मैं असीम खुशी भी महसूस कर रही थी. अमित दूर खड़े सब देख और सून रहे थे. पास आते ही कहा, मैडम अब तो तबयत ठीक हो गई ना. मैं खिलखिला उठी. वो सारे गज़रे ले कर हम घर के पास के ही मंदिर मे चढ़ा आए और उनमे से एक गज़रा अमित ने मेरे बालों में लगा दिया. मेरा रोम-रोम खिल उठा.

अक्सर ज़िन्दगी की खुशियाँ इन छोटे-छोटे पलों में होती है और हम तलाशते कहीं और हैं...

#SwetaBarnwal 

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