Tuesday, 20 February 2018

ये मासूमियत 


सुबह प्रातः काल उठ कर पढ़ना अक्सर लोगों को भाता नहीं. मेरी भी आदत कुछ ऐसी ही थी. सारी रात जाग कर कितना भी पढ़ लूँ, पर सुबह उठने के नाम से नानी याद आती थी. वैसे ये आदत आज भी नहीं गई है. खैर ये उस समय की बात है जब हम नौवीं कक्षा मे थे. पिताजी हमारे सुबह के चार बजे रोजाना उठ कर बागवानी और योगा किया करते थे. रोज हमे और हमारी को भी वो ५ :00 बजे सुबह उठा दिया करते थे पढ़ने को. बहुत गुस्सा भी आता था और खीज भी होती थी. समझते थे कि वो जो कर रहे हैं, हमारी भलाई के लिए कर रहे हैं. पर क्या करें निन्द्रा देवी की हम पर असीम कृपा थी.
हमारा घर दोतल्ला हुआ करता था. एक दिन हमने कहा पिताजी हम ऊपर वाले कमरे में सोएंगे. पिताजी ने कहा कि फ़िर सुबह कैसे उठोगी तुम लोग. हम दोनों बहनों ने साथ मे कहा कि "अलार्म से". पिताजी को यकीन तो नहीं था, फिर भी हमे जाने दिया. उस वक़्त हमारे गाँवों में बिजली की बड़ी विकट स्थिति थी, वो आती कम और जाती  ज्यादा थी. इसलिए हम साथ मे लालटेन भी ले गए ऊपर कमरे में. उस दिन हमने पक्का मन बनाया कि सुबह उठकर पढ़ाई करेंगे और पिताजी को निराश नहीं होने देंगे.
ख़ैर रात को हम दृढ़ संकल्प हो, अलार्म लगा लालटेन की रोशनी को मध्यम कर दोनों बिस्तर के पास की ही कुर्सी पर रख सोने चले गए. आख़िर हमारी नींद खुली अलार्म से और हम दोनों बहनों ने अर्द्ध निन्द्रा मे ही हाथ बढ़ाया अलार्म को बंद करने के लिए.
पर हमारी बेवकूफी कहिए या नींद का आलम की हम दोनों ने ही अलार्म बंद करने के लिए लालटेन की  क्नाॅब (knob) को घुमाना शुरू कर दिया. नींद मे इतनी बेखबरी और मदहोशी थी कि हमे ये भी ख़्याल ना आया कि अलार्म बंद करने के लिए लालटेन की knob नहीं घड़ी की स्विच प्रेस करनी थी. इसी बेख्याली मे हमने लालटेन ऑफ़ कर दिया पर वो अलार्म बंद ना हुआ. अंततः हम दोनों बहनें कान पे तकिया रख सो गए. हमे समझ ही नहीं आया कि आख़िर वो अलार्म बंद क्यूँ नहीं हुआ. ख़ैर बाद में हमे बहुत डांट पड़ी माँ पिताजी से हमारी कुंभकरणी निन्द्रा के लिए...
आज भी हम उस रात को याद करते हैं तो हमारी हंसी नहीं रुकती ये सोच-सोच कर कि सच में कैसी नींद थी हमारी...

#SwetaBarnwal 

No comments:

ऐ विधाता...!

 ऐ विधाता...! ना जाने तू कैसे खेल खिलाता है...  किसी पे अपना सारा प्यार लुटाते हो, और किसी को जीवन भर तरसाते हो,  कोई लाखों की किस्मत का माल...