ये उन दिनों की बात है
ये उन दिनों की बात है जब मोबाइल फोन्स दूरदर्शन पे ही दिखा करते थे। जब mail, orkut, what's up, facebook, twitter in सबके नाम भी नहीं सुने थे। अपने दिल की बात लोग कागजों पे बयान करते थे, जिसे हम खत कहते
हैं। मैं (सपना) नौवीं की कक्षा में पढ़ने वाली एक शांत लड़की हुआ करती थी। हमारे विद्यालय के एक शिक्षक मुझे बहुत भाते थे। उनका अंदाज़, उनकी आवाज, उनका व्यक्तित्व बहूत ही मनमोहक था। हर वक़्त दिल बस उनके ही ख्यालों मे गुम रहता था। पता नहीं वो अहसास कैसा था, पर जो भी था बहुत मधुर और बिल्कुल पाक था। वो भी मुझे बहुत सराहते थे, बहुत प्रोत्साहित करते थे। हर विद्यार्थी से ज्यादा मुझे मान देते थे। इसकी एक वजह शायद ये भी थी कि मैं एक होनहार विद्यार्थी थी।
धीरे-धीरे वक़्त गुज़रता गया और मेरी दसवीं की परीक्षा के दिन आ गए। और फिर वो दिन भी आया जब हमारा रिश्ता उस विद्यालय से ख़तम हो गया। पर वो कसक दिल से नहीं गई, वो जज़्बात दिल में ही रहे। उस वक़्त हमारे लिए प्यार का मतलब सिर्फ़ परिवार से शुरू हो परिवार पे ही खत्म होता था। अपने शिक्षक के लिए मेरे मन में जो अहसास था उसका क्या नाम होना चाहिए, ये मुझे पता नहीं था उस वक़्त। बस उनका सामने होना मेरे लिए बहुत बड़ी बात होती थी। मैं उस रिश्ते को एक नाम देना चाहती थी, पर क्या..? कोई आभास ना था मुझे और ना ही रिश्तों के नाम पता थे मुझे उन दिनों। यूं ही कश्मकश मे ज़िन्दगी गुज़रती जा रही थी। आख़िर एक दिन मैंने उन्हें अपने घर बुलाया और कहा कि आप मुझे बहुत अच्छे लगते हैं और मुझे बहुत पसंद है, मैं आपको अपने साथ रिश्ते की डोर मे बांधना चाहती हूँ। आपसे बहुत प्यार करती हूँ मैं और आपको अपना संरक्षक मानती हूँ। मेरी इन बातों को सुन वो बहुत अचंभित हुए, उन्हें यकीनन ऐसी उम्मीद नहीं रही होगी।
मैं भले उस वक़्त मासूम और नादान थी पर वो एक जिम्मेवार, पारिवारिक व्यक्ति थे। वक़्त औरउम्र का लंबा फासला था हमारे बीच। मेरी बातों पे वो अपनी प्रतिक्रिया ज़ाहिर करते उससे पहले ही शायद उन्हें मेरी हाथों में वो सूत्र नज़र आ गया जो एक बहन अपने भाई की कलाई पे बांधती है, #राखी। उस दिन रक्षा बंधन था। उन्होनें मुझे गले से लगा लिया और कहा, " तेरे जैसी बहन भला किसे नहीं चाहिए"। और अंततः इस कदर मैंने हमारे उस खूबसूरत से रिश्ते को एक खूबसूरत सा नाम दे दिया। शायद उस वक़्त दुनिया का सबसे खूबसूरत रिश्ता वही था मेरी नज़र में। भाई बहन का प्यार, नोंक झोंक, मस्ती मजाक, दोस्ती, एक मजबूत सुरक्षा कवच, सब कुछ तो मिल गया था मुझे उस एक रिश्ते में।
सच ही कहा है किसी ने उन दिनों बचपन में प्यार की परिभाषा बड़ी ही खूबसूरत और सादगी पूर्ण हुआ करती थी। आज जब देखती हूँ इस बदलते समाज को तो सोचती हूँ कि आखिर कहां गुम हो गई वो मासूमियत, वो अल्हड़पन, वो बेबाकपन, वो मासूम बचपन। कहां खो गए वो निःस्वार्थ रिश्ते और वो पाकिज़ा मोहब्बत।सच मे #"ये_उन_दिनों_की_बात_है".....
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