Thursday, 22 February 2018

मैं औरत हूँ...

मैं औरत हूँ
मैं जीना चाहती हूँ 
अपनी शर्तों पर ज़िन्दगी,
है ख़ुद से प्यार मुझे, 
नहीं जीना मुझे दोहरी ज़िन्दगी, 
मुझे सीता और सावित्री नहीं बनना, 
ना सतीत्व की आग में है जलना, 
नहीं शौख है मुझे  देवी बनने का,
इंसान हूँ, यही बहुत है मेरे लिए,
नहीं जीना मुझे नपी-तुली ज़िंदगी, 
हर वक़्त मर्यादा के बंधनों में,
नहीं कैद रहना है मुझको,
मेरी मर्यादा कपड़ों से होती है,
खींची गई है मेरे लिए लक्ष्मण रेखा, 
घर हो या बाहर, चुप रहती हूँ, 
घुटती और लूटती रहती हूँ,
देवी बना कर पूजते हैं मुझे,
पर हकीक़त मे भोग्या समझते हैं मुझे,
बच्चे पैदा करने की मशीन से ज्यादा, 
नहीं है कोई औकात मेरी,
घर के किसी फैसले मे,
नहीं चाहिए किसी को राय मेरी,
सारे नियम और परम्पराएं मेरे लिए, 
पालन करना है हमे बिना सवाल किए, 
हमे स्वतंत्रता और प्रेम का अधिकार नहीं, 
नाहीं अपनी कोख जने पर अधिकार है,
मैं जब तक मौन हूँ घर आबाद है, 
मेरी आवाज़ उठाते ही सब बर्बाद है, 
तुम मुझे जला सकते हो, मार सकते हो, 
मेरी आवाज़ को दबा सकते हो, 
क्यूंकि मैं एक औरत हूँ,
फिर भी एक सुकून होगा मन मे, 
कि मैंने तुम्हारी झूठी सत्ता को 
स्वीकारा नहीं,
मैं सच्चाई हूँ,
मैं औरत हूँ....

#SwetaBarnwal 

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