Thursday, 8 March 2018

भोलवा...

(एक कथा) 


भोलवा अरे भोलवा कहाँ मर गया तू...! 
भोलवा, जब से होश संभाला था सब इसी नाम से बुलाते थे उसे। कौन था वो, कहाँ से आया था, उसके मां-बाप कौन थे, कोई नहीं जानता था। भोलवा ने भी इस गाँव को ही अपना घर और यहां के लोगों को अपना परिवार मान लिया था। जब जिसे काम होता वो भोलवा को आवाज़ लगाता और वो भी बड़े अपनाइयत से सबके काम कर देता। बदले में उसे सबसे मेहनताने के तौर पर कुछ ना कुछ मिल जाता था, जिससे उसके अकेले की ज़िन्दगी मजे मे गुज़र रही थी।

वो भी जवानी की दहलीज पर कदम रख रहा था, उसके अरमानों को भी पंख लग रहे थे। बड़ी ख्वाहिश थी उसकी कि, उसका भी कोई अपना हो, घर हो, परिवार हो। पर अगले ही पल वो अपने ख्यालों को झटक देता। उसे लगता था कि उसे सपने देखने का कोई हक़ नहीं। अब तक की ज़िन्दगी उसकी गाँव के चौपाल पर ही कटी थी। एक दिन उसने गाँव के बाहर खाली पड़ी एक ज़मीन पर अपनी छोटी सी झोपड़ी बना ली। शायद ये उसके सपनों की पहली उड़ान थी, जिसमे उसने रंग भरने शुरू कर दिए थे। 

एक दिन गाँव के बच्चों को विद्यालय, जो कि गाँव से दूर था, पहुंचा कर लौट रहा था। अचानक उसने देखा कि एक पागल सी लड़की को कुछ लड़के अपने उन्माद और शराब के नशे में छेड़ रहे थे। उस लड़की के अंगवस्त्र फटे हुए थे। वो साधारण सी दिखने वाली एक पागल लड़की मे पता नहीं उन लड़कों को क्या नज़र आया कि वे अपनी हवस की भूख मिटाने उसे नोचने लगे। भोलवा ने एक क्षण भी गंवाए बिना उन लड़कों की जम के धुलाई की। लड़की बिलकुल सहम सी गई थी। भोलवा को देखते ही वो उसे लिपट कर फुट-फुट कर रोने लगी। शायद ज़िन्दगी में पहली बार कोई फरिश्ता मिला उसे, वरना इससे पहले सबने उस पर गंदी नज़र ही डाली थी।

भोलवा उसे अपने साथ अपनी झोपड़ी ले आया। उसका ख़्याल रखा, उसे संभाला, दिलासा दिलाया उसकी सुरक्षा का। धीरे-धीरे वो सामान्य होने लगी। उसे अपना नाम और परिवार तो याद नहीं था पर लोग उसे फुलवा नाम से बुलाते थे। फुलवा भी एक अनाथ थी उसे भोलवा के रुप मे एक सच्चा रहबर मिला। पर ये जालिम दुनिया जो एक जवान लड़के और लड़की के साथ को ग़लत नज़र से देखती है। ऐसा ही कुछ भोलवा के साथ हुआ। गाँव वाले उस पर दबाव बनाने लगे कि उस लड़की को घर से बाहर निकालो। ना जाने किस किस घाट का पानी पिया होगा उसने। हमारी बेटियों पर ग़लत प्रभाव पड़ सकता है इसका। भोलवा समझ नहीं पाते रहा था कि आख़िर इसमे फुलवा की क्या गलती जो लोग उसके साथ अभद्रता कर रहे हैं।

पूरी रात भोलवा यूँ ही बैठा, सोंचता रहा। फुलवा से उसकी परेशानी देखी नहीं गई। वो उसके पास आई और कहने लगी, तुमने मेरी बड़ी मदद की, तुम एक नेक दिल इंसान हो, मेरी वजह से अपनी ज़िन्दगी मत बर्बाद करो। मैं रात के अंधेरे में ग़ायब हो जाती हूँ। कल से सब ठीक हो जाएगा। ये कह वो जाने लगी। भोलवा ने उसका हाथ पकड़ा और बोला गर तुम मुझे ग़लत ना समझो तो एक बात पूछूं। फुलवा ने स्वीकृति मे सर हिलाया।
"क्या तुम मेरी जीवनसंगनी बनोगी" और भोल्वा ने उसके सामने हाथ जोड़ लिए। इसे तुम मेरी हमदर्दी या कोई मजबूरी ना समझना। बस तुम्हारी मासूमियत मेरे दिल को छू गई। फुलवा को तो जैसे बिन मांगे मुराद मिल गई।
वो लिपट कर भोलवा से आज खुब रोना चाहती थी। उसने आज एक खुलासा किया कि वो कोई पागल नहीं है बल्कि इस जालिम दुनिया से ख़ुद को और अपनी अस्मिता को बचाए रखने की एक कोशिश थी।

अगले दिन दोनों ने मंदिर में जा कर साधारण तरीके से शादी कर ली। अब तो गाँव वालों को भी कोई दिक्कत नहीं थी। अपितु सबने भोलवा की शादी में खुब मजे किए और सबने वर-वधु को ढेर सारी शुभकामनाएं दीं। सारे गाँव वालों ने मिलकर घर के आवश्यक सामनों को भी इकट्ठा किया और एक नव दंपत्ति की पूरे जोश के साथ स्वागत किया। इस तरह से एक प्यारा रिश्ता अपने अंज़ाम को पहुंचता है....



#SwetaBarnwal 

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