Thursday, 8 March 2018

ग़ज़ल 



मैं चलता रहा मंज़िल की तलाश में, 
मंज़िल मिली भी तो कब, मेरे आख़री प्रयास में... 

चाहता तो रुक सकता था मैं भी, 
पर मंज़िल की प्यास कब रुकने देती मुझे... 

अनवरत अथक चलती रही अनजाने पथ पे,
जो मंज़िल मिली तो सुकून मिल गया मुझे...

मंज़िल पाने की ऐसी तलब लगी मुझको, 
ना दिन का चैन देखा ना रातों को होश आया... 

ऐ साकी...! गर हो कुछ पाने की ख्वाहिश दिल में,
रख इरादे मज़बूत और दिल मे कुछ कर गुज़रने का अरमान...

#SwetaBarnwal 

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