आधुनिकता
ऐसी चाल चलें कि
हम अपनी ही चाल भूल गए,
आधुनिकता की वो लहर चली,
कि अपनी पहचान भूल गए...
फ़िर कैसे हम आधुनिक कहलाए...
कपड़ों से नहीं होती है ये,
ना होती है किसी दिखावे से,
अरे आधुनिकता तो जमी नहीं है
हम सबके विचारों मे...
फ़िर कैसे हम आधुनिक कहलाए...
सबसे होड़ लगा रखी है हमने
नापी नहीं चादर अपनी,
दिखावे की ऐसी लगी बीमारी,
सादगी खो गई अंधियारों में...
फ़िर कैसे हम आधुनिक कहलाए...
जहाँ कोख मे मर जाए बेटी,
दहेज की बेदी पे जल जाए बेटी,
जहाँ सपनों पे तेरे पाबंदी हो,
बेड़ियों मे जकड़ी जहां बेटी हो,
फ़िर कैसे हम आधुनिक कहलाए...
जहाँ दिन का उजियारा भी हमे डराये
साया भी अपना हो ना पाए,
प्रेम की भाषा कोई समझ ना पाए,
नफरत की आंधी जब फैली हो,
फ़िर कैसे हम आधुनिक कहलाए...
बुजुर्ग माँ-बाप वृद्धाश्रम में हों,
बच्चे जहां आया के हाथों पले,
बूढ़ी आंखें हर पल ताके रस्ता,
ना जाने कब बच्चों को उनकी सुध आए
फ़िर कैसे हम आधुनिक कहलाए...
हर रिश्ता जहां पे लज्जित हो,
हर आंखें जहां पे शंकित हो,
अविश्वास का घनघोर अंधेरा हो,
बदहाली ने जहां पे डाला डेरा हो
फ़िर कैसे हम आधुनिक कहलाए...
#SwetaBarnwal
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