Thursday, 8 March 2018

वैधव्‍य...! क्या एक अभिशाप


अभी रागिनी के हाथों की मेहंदी और पैरों के महवार भी नहीं छूटे थे कि सरहद से एक दिल दहलाने वाली खबर आई। उनके पति सरहद की जंग में शहीद हो गए। जिन आँखों ने अभी सुरमई सपने देखने शुरू ही किए थे उन आँखों के आगे अंधेरा सा छा गया। वो गिर कर बिखरने ही वाली थी कि रागिनी के देवर ने उसे संभाल लिया. पूरा परिवार शोक मे डूब चुका था।
जैसे तैसे कुछ दिन बीत गए। घर में लोगों की गहमागहमी कम हुई।पति के काम क्रिया समाप्त होने तक  रागिनी तो जैसे सूख कर काँटा हो गई थी। पति के जाने के बाद वो हंसना गुनगुनाना भी जैसे भूल चुकी थी। एक चंचल सी शोख लड़की गुमनामी के अंधेरे में जैसे खो सी गई थी। 
छोटे जगह मे लोगों की संकुचित सोंच का रागिनी को अक्सर सामना करना पड़ रहा था। आए दिन लोगों के ताने से उसने जीने की उम्मीद ही छोड़ दी थी। रागिनी का देवर अभिनव बहुत ही समझदार और सुलझा हुआ इंसान था। वो इस कदर अपनी भाभी को घुट घुट कर रोज मरते देख रहा था। अभिनव बहुत कोशिश करता कि उसकी भाभी ख़ुश रह सके। उसने अपने परिवार वालों के साथ अपनी एक राय रखी जिससे परिवार वालों को तो कोई ऐतराज़ नहीं थी पर गाँव में पंचों की राय बहुत जरूरी थी। 
उम्मीद के अनुसार पंचों में खलबलि सी मच गई। विधवा पुनर्विवाह...! आख़िर कैसे था ये मुमकिन एक पुरुष प्रधान समाज में, जिसमें एक पुरुष एक पत्नी के होते हुए दूसरी शादी की इज़ाज़त देता है वहीं औरतों को ताउम्र वैधव्य के साथ जीने को मजबूर कर देता है। अभिनव ने पुरजोर पंचों का विरोध किया, उन्हें समझाया कि ये रीति रिवाज, ये रस्में और ये दुनिया समाज सब हम इंसानों के लिए है, हमारी खुशियों के लिए है ना कि हम इंसान इनके लिए हैं।
आख़िर कुछ मशक्कत के बाद सब ने अभिनव की बातों का समर्थन किया और इस रिश्ते को स्वीकृति दे दी। आज अभिनव और रागिनी एक साथ खुशहाल ज़िन्दगी जी रहे हैं। सच मे हम कितने मतलबी और स्वार्थी हो गए हैं। रस्मो-रिवाज़ों को हमने इंसानियत से ऊपर तवज्जोह दे डाली है। हमारी ही छोटी सोच ने हमे ये सोचने पे मजबूर कर दिया कि "वैधव्य...! क्या एक अभिशाप" ।



#SwetaBarnwal


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