Tuesday, 3 December 2019

श्रृंगार...

कैसे तेरा श्रृंगार करूँ मैं बिटिया,
कैसे तुझसे लाड लड़ाऊं मैं बिटिया,
हर मोड़ पर दुश्मन बैठे हैं
कैसे तुझको सबसे बचाऊं मैं बिटिया,
ना जाने कितनी निर्भया लूटी गई,
और ना जाने कितनी जल कर राख हुई,
किस किस से आख़िर कैसे बचाऊं तुझको,
हर कदम पे ज़ालिम बैठे हैं,
माँ हूँ मैं तेरी हर आहट पे डर सी जाती हूँ,
कौन है अपना और कौन पराया
मैं सबसे खौफ़ खाती हूँ,
ना जाने कब कौन सी नजर उठे तेरी ओर,
ना जाने किसकी हैवानियत जाग उठे,
सोचूँ मैं ये खड़े खड़े
ना जाने किस मिट्टी से विधाता ने इसे गढ़े,
आख़िर क्यूँ नित नए हैवानियत के खेल खेल रहा है कोई,
ना जाने क्यूँ बेटियों की बोटियां नोच रहा है कोई,
क्या दोष था उन मासूम बच्चियों का,
क्या गुज़री होगी उनके माँ बाप पे,
कैसे उन्होंने रात गुज़ारी होगी,
कैसे अपनी बेटी की बोटियां समेटी होंगी,
धरती का सीना भी फट जाता होगा,
जब कोमल कलियां कुचली जाती होंगी,
हर नज़र से कैसे बचाऊं तुझको,
जी चाहता है दुनिया से छुपा लूँ तुझको,
अपने आँचल के छांव मे समेट कर,
किसी दूसरे जहां मे ले जाऊँ तुझे,
हर नज़र यहाँ पर गंदी है,
हर छुअन यहाँ की भद्दी है,
कैसे ये बात अभी मैं समझाऊं तुझे,
छोटी सी है तू अभी, नादान उमर है तेरी,
अब नहीं कृष्ण आयेंगे द्रौपदी की लाज बचाने को,
ना रचेगा तेरे लिए अब इतिहास कोई,
तुझे ख़ुद ही रण चंडी बन जाना होगा,
हैवानों को उनकी औकात बतानी होगी,
आ गया है वक्त कुछ कर गुजरने की,
ऐसी नीति बनानी होगी जो दहल उठे दुष्टों का सीना,
बढ़े हाथ जो बेटियों को छूने
कुचल उन्हें आगे बढ़ जाना होगा,
बंद करो ये मोमबत्तियां जलाना,
नही चाहिए अब कोई झूठी हमदर्दी,
ये वीरों की धरती है कोई हिजड़ों की ये बस्ती नहीं,
यहां रामायण और महाभारत छिड़ जाते हैं
जो नारी की स्मिता पे बुरी नजर किसी ने डाली,
उठा लाओ विष्णु का सुदर्शन
और छिन लो उन मर्दों से मर्द होने का दंभ
जिसने छीना है हमारी बेटियों से उनकी आज़ादी,
तभी तो कर पाएगी हर माँ अपनी बेटियों का श्रृंगार,
वर्ना खत्म हो जाएगा श्रृंगार का अस्तित्व
और ये सृष्टि हो जाएगी विरान...


#SwetaBarnwal

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