इस भागम भाग भरी जिंदगी में,
मैं अब थोड़ी सी थकने लगी हूँ,
किस्तों मे बंटी हुई ये जिन्दगी,
अरमान सारे बिखरे-बिखरे से,
समेटना चाहूँ भी तो,
हाथों में कुछ आता नहीं,
मुद्दत हो गए हैं ख़ुद से ही मिले हुए,
तुझसे मिलने की चाह में
ऐ ज़िंदगी....
मैं ख़ुद से ही बिछड़ने लगी हूँ,
ज़ख्म गहरा था, चोट दिल में लगी थी,
उलझने बड़ी थी और रस्ते थे सारे बंद,
हौसला मगर फिर भी हुआ ना कम,
सोचा था सुलझा ही लुंगी तुझे,
बड़े प्यार से यूँ मना लुंगी तुझे,
पर दुनियादारी मे हम थोड़े कच्चे रह गए,
सब बड़े हो गए और अक्ल मे हम बच्चे रह गए,
तुझको सुलझाने की जद्दोजहद मे,
ऐ ज़िंदगी...
ख़ुद को ही उलझा बैठे हैं हम,
माना तू किसी के लिए रुकती नहीं,
किसी मोड़ पर थमती नहीं,
पर क्या तू कभी थकती नहीं....?
ज्यादा ना सही, दो पल के लिए रुक तो,
थोड़ा ठहर, एक मौका मुझको भी तो दे,
सुलझा कर दिखाऊँ तेरी उलझनों को,
ऐ ज़िंदगी...
एक बार ख़ुद से ख़ुद को मिलने तो दे,
फ़िर से ख़ुद को गले लगाने तो दे,
जो बिखर गया है, उसे समेटने तो दे,
आशाओं को फिर से बटोरने तो दे,
ज़ख्म जो अब तक हरे हैं,
एक बार मरहम उन पर लगाने तो दे,
टूटी हुई उम्मीदों को फिर से जोड़ने तो दे,
कुछ पल ख़ामोशी से कुछ सोचने तो दे,
ऐ ज़िंदगी...
एक बार मेरे आशियाने मे भी थोड़ी सी रौशनी तो दे.
वक़्त है कि रुकता नहीं,
वक़्त है कि थमता नहीं,
बहुत कोलाहल है चहूँ ओर मेरे,
चंद लम्हें तो दे सबकुछ समझने के लिए
फ़िर से मुस्करा उठूंगी मैं भी,
समेट कर अपने वज़ूद को,
एक बार फिर तुझसे नजरें मिलाऊँगी मैं,
ऐ ज़िंदगी...
एक बार मुझ पर भी ऐतबार कर के तो देख...
#SwetaBarnwal
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