Tuesday, 12 February 2019

चला जा रहा था मैं ज़िंदगी को जीते...

ज़िन्दगी की अनजान राहों पर
मन में यूँ ही कई सवाल लिए
अपने और परायों के बीच से गुज़रते
चला जा रहा था मैं ज़िंदगी को जीते,

कहाँ था जाना और क्या था पाना
ना ही रास्ते की थी कोई पहचान
और ना ही मंज़िल का था ठिकाना
आश और निराश मे लगाते हुए गोते
चला जा रहा था मैं ज़िंदगी को जीते,

अपने ही ख्यालों में मैं चला जा रहा था
ज़िन्दगी को बेपरवाह जिए जा रहा था
वक़्त को अपनी मुट्ठी में कैद किए
अपने ही अरमानों की आहुति देते
चला जा रहा था मैं ज़िंदगी को जीते,

कभी हारता तो कभी खुद से जितता
ज़िन्दगी से हर घड़ी कुछ सीखता रहा
ठोकरों से गिरता कभी गिर के संभलता
हर चोट पे अपने ख़ुद से मरहम लगाते
चला जा रहा था मैं ज़िंदगी को जीते,

#SwetaBarnwal 

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