Friday, 1 May 2020

ओ कोरोना...!

ओ कोरोना...!
आख़िर तुझे मैं क्या नाम दूँ...
मौत कहूँ या जिंदगी का नाम दूँ,
अपनों से दूरी की वज़ह कहूँ
या ख़ुद को ख़ुद से मिलवाने का ज़रिया कहूँ,
दर्द कहूँ या कह दूँ दवा तुझे,
हवाएं दूषित थी,
ज़िंदगी अस्त व्यस्त थी,
जानवर और पंछी त्रस्त थे,
इंसान घमण्ड मे सारे मदमस्त थे,
गाड़ियों और फैक्ट्रियों का शोर था,
प्रदूषण चारो ओर था
अपराध घनघोर था,
सब के मन में चोर था
नदियों का पानी मैला था,
हवाओं में फैला ज़हर था,
रिश्तों में उसका दिखता असर था,
किसी के पास किसी के लिए ना वक़्त था,
हर कोई अपने मे ही बस व्यस्त था,
पैसों की दौड़ थी,
भागने की बस होड़ थी,
सब को ख़ुद पे गुमान था,
विज्ञान पर अभिमान था
जंगलों को काट रहा था,
नदियों की धारा मोड़ रहा था,
प्रकृति के साथ कर रहा खिलवाड़ था,
गगनचुंबी इमारतों से
आसमान को दे रहा चुनौती था,
इंसान को अपने सामर्थ्य पर
हो गया घमण्ड था,
तभी अचानक एक छोटा सा
Virus औचित्य मे आया,
जिसने ला कर रख दिया
सारी दुनिया को घुटनों पर,
दिखा दिया औकात इंसान को,
मौत का खौफ़ यूँ हर ओर छाया,
विज्ञान भी तब कुछ काम ना आया,
क़ैद करने चला था जो पूरे संसार को
कैद हो कर रह गया वो
अपने ही घर की चारदिवारी मे,
आज नदियां लहरा रही हैं,
पंछी चहचहा रहे हैं,
हवाओं में ताजगी है,
ज़िंदगी में सादगी है,
जीव जंतु मस्त है,
प्रकृति भी आज स्वस्थ है,
धरा आज ख़ुशहाल है,
सृष्टि भी आज निहाल है.
समझ नहीं आता
ओ कोरोना...!
आख़िर तुझे मैं क्या नाम दूँ...
तुझे ज़िंदगी कहूँ
या कोई मौत का पैगाम हो तुम,
कोई ख़ुशी हो
या संहार का संचार हो तुम,
सृष्टि का संतुलन हो
या महाकाल का काल हो तुम,
अपनों का विछोह हो
या अपनों का समावेश हो तुम,
कोई भ्रांति हो
या विश्व शांति का पैगाम हो तुम,
कोई रोग हो,
या इंसानी रोगों का उपचार हो तुम,
ओ कोरोना...!
आख़िर तुझे मैं क्या नाम दूँ...


#SwetaBarnwal


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