फ़िर भी कभी थकती नहीं,
देकर अपने मुह का निवाला
सन्तान को पालती है माँ,
सर्वस्व लुटा कर भी अपना,
आह नहीं भरती है माँ,
जाने क्यूँ उस माँ के आँखों से
आंसू आज थमते नहीं,
ख़ुद सो जाती है गीले मे,
सन्तान को हर मुश्किल से बचाती है माँ,
हर लम्हे को वो खास बना देती है,
अपनी ज़िंदगी का हर एहसास जिसके नाम कर देती है,
क्यूँ दो पल का भी वक़्त नहीं दे पाता है वो,
जब वृद्धावस्था में पहुंच जाती है माँ,
चार चार संतानो को अकेले पाल लेती है माँ,
फ़िर भी बुढ़ापे मे चार रोटी को तरस जाती है माँ,
अरे किस्मत भी हार मान जाती है जब,
माँ की दुआ एक नया रंग लाती है तब,
माँ ज़मी पर जन्नत का एहसास है,
बच्चों के लिए जैसे वो खुला आकाश है,
लौट जाती है हर बलाएँ टकरा कर,
सामना जो कभी माँ की दुआओं से होता है,
थक कर सो जाती है रातें भी अक्सर,
माँ ने तो इन्तजार मे सदियाँ गुज़ारी है,
मत देना कभी कोई कष्ट उस माँ को,
जिसने तेरे लिए प्रसव का अनकहा दर्द झेला है,
रखा है नौ महीने तुझको कोख में,
जो तेरे इस दुनिया में आने की वज़ह बनी है,
कई मन्नतें मांगी है उसने तेरे लिए,
कई रातें गुज़ारी है जागती आंखों से उसने,
लाख रही बिमार फ़िर भी,
तेरे लिए किए हैं कई व्रत उसने,
कितने ही चौखटों पे अपना सर है पटका,
तेरे लिए ख़ुद विधाता से भी लड गई माँ,
उसे किसी और प्यार की जरूरत नहीं,
जिसे माँ के प्यार की दौलत मिल गई...
#SwetaBarnwal
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