बुढ़े माँ बाप या घर में कोई बुजुर्ग,
करते हैं रखवाली घर की जैसे कोई दुर्ग,
ये हैं घर की वो दिवार,
जो अपने आशीर्वाद से रोकते हैं हर वार,
संस्कारों की खान हैं ये,
बच्चों के लिए तो जैसे वरदान हैं ये,
एक मधुर स्मृति होते हैं ये
हमारे सुदृढ़ वर्तमान की नींव हैं ये,
अंधेरी ज़िंदगी में
टिमटिमाते लौ की भांति होते हैं ये,
प्यार इनका कवच
और इनका आशीर्वाद हमारा ढाल बन जाए,
जब कभी भी ज़िंदगी में
हमारे अनचाहा कोई मुकाम आ जाए,
ख़ुद को कभी जलाया,
तब जाकर आज यहां हमें पहुंचाया,
हर मुश्किलें सहीं हमारी ख़ातिर,
हम पर अपना सर्वस्व लुटाया,
ये हैं तो हम हैं,
वर्ना हम क्या और हमारा अस्तित्व क्या,
मत कष्ट पहुंचाना इनको तुम,
मत बनना इनके आंसुओं की वज़ह कभी,
ये हैं घर की वो दीवार
जो निरस्त कर दें काल का भी प्रहार,
ग़र आए जीवन में कोई तूफ़ान,
अपने अनुभव से कराएं नैया पार,
बड़े बूढ़ों का जो सम्मान करे,
उनके जीवन में सुख का संचार रहे...
आज हम पाश्चात्य सभ्यता मे ऐसे रंगे,
भूल के अपनी संकृति वृद्धों का अपमान करें,
बच्चों को आया के हाथ सौंप,
बुढ़े माँ बाप को तिरस्कृत कर वृद्धाश्रम पहुंचाये,
कैसे आए बच्चों मे संस्कार
जब हम ही संस्कार हीन हो जाएं,
जो आज दिखाओगे तुम बच्चों को,
कल तुम भी वही पाने के हकदार बनोगे,
ये वक़्त का पहिया है
चलता ही जाएगा,
जो तू आज बोयेगा,
वो ही कल पाएगा,
बीज बो कर नफ़रत की,
भला सम्मान कैसे पाएगा...
अब भी वक्त है
सम्भल जाओ तुम,
ग़र जीना चाहते हो बुढ़ापे मे शान से,
तो जीने दो अपने बुजुर्गों को सम्मान से...
आओ मिल कर आज ये संकल्प करें,
कभी ना हो घर में अपमान बुजुर्गों का,
मिट्टी के ये बर्तन नहीं
जो जब जी चाहा फोड़ दिया,
ये कोई जानवर भी नहीं,
जो रस्ते पर मरने छोड़ दिया,
लहू देकर अपना जिन्होंने पाला हमको,
भला क्यूँ तिरस्कृत हो बुढ़ापे मे वो,
वृद्धाश्रम मे वो नन्ही किलकारी को तरसे,
और घर में बच्चे संस्कारों को तरसे,
पैसों की चकाचौंध मे इंसानों ने रिश्ते खोए,
हर मुसीबत आई जब भी बुढ़ापा आया,
क्यूँ बिसराते जा रहे हैं बच्चे,
अपने ऊपर किए अहसान बुजुर्गों का,
बड़ी किस्मत से मिलता है यारों,
प्यार और आशीर्वाद बुजुर्गों का...
#SwetaBarnwal
करते हैं रखवाली घर की जैसे कोई दुर्ग,
ये हैं घर की वो दिवार,
जो अपने आशीर्वाद से रोकते हैं हर वार,
संस्कारों की खान हैं ये,
बच्चों के लिए तो जैसे वरदान हैं ये,
एक मधुर स्मृति होते हैं ये
हमारे सुदृढ़ वर्तमान की नींव हैं ये,
अंधेरी ज़िंदगी में
टिमटिमाते लौ की भांति होते हैं ये,
प्यार इनका कवच
और इनका आशीर्वाद हमारा ढाल बन जाए,
जब कभी भी ज़िंदगी में
हमारे अनचाहा कोई मुकाम आ जाए,
ख़ुद को कभी जलाया,
तब जाकर आज यहां हमें पहुंचाया,
हर मुश्किलें सहीं हमारी ख़ातिर,
हम पर अपना सर्वस्व लुटाया,
ये हैं तो हम हैं,
वर्ना हम क्या और हमारा अस्तित्व क्या,
मत कष्ट पहुंचाना इनको तुम,
मत बनना इनके आंसुओं की वज़ह कभी,
ये हैं घर की वो दीवार
जो निरस्त कर दें काल का भी प्रहार,
ग़र आए जीवन में कोई तूफ़ान,
अपने अनुभव से कराएं नैया पार,
बड़े बूढ़ों का जो सम्मान करे,
उनके जीवन में सुख का संचार रहे...
आज हम पाश्चात्य सभ्यता मे ऐसे रंगे,
भूल के अपनी संकृति वृद्धों का अपमान करें,
बच्चों को आया के हाथ सौंप,
बुढ़े माँ बाप को तिरस्कृत कर वृद्धाश्रम पहुंचाये,
कैसे आए बच्चों मे संस्कार
जब हम ही संस्कार हीन हो जाएं,
जो आज दिखाओगे तुम बच्चों को,
कल तुम भी वही पाने के हकदार बनोगे,
ये वक़्त का पहिया है
चलता ही जाएगा,
जो तू आज बोयेगा,
वो ही कल पाएगा,
बीज बो कर नफ़रत की,
भला सम्मान कैसे पाएगा...
अब भी वक्त है
सम्भल जाओ तुम,
ग़र जीना चाहते हो बुढ़ापे मे शान से,
तो जीने दो अपने बुजुर्गों को सम्मान से...
आओ मिल कर आज ये संकल्प करें,
कभी ना हो घर में अपमान बुजुर्गों का,
मिट्टी के ये बर्तन नहीं
जो जब जी चाहा फोड़ दिया,
ये कोई जानवर भी नहीं,
जो रस्ते पर मरने छोड़ दिया,
लहू देकर अपना जिन्होंने पाला हमको,
भला क्यूँ तिरस्कृत हो बुढ़ापे मे वो,
वृद्धाश्रम मे वो नन्ही किलकारी को तरसे,
और घर में बच्चे संस्कारों को तरसे,
पैसों की चकाचौंध मे इंसानों ने रिश्ते खोए,
हर मुसीबत आई जब भी बुढ़ापा आया,
क्यूँ बिसराते जा रहे हैं बच्चे,
अपने ऊपर किए अहसान बुजुर्गों का,
बड़ी किस्मत से मिलता है यारों,
प्यार और आशीर्वाद बुजुर्गों का...
#SwetaBarnwal
1 comment:
कुछ कड़वी सच्चाइयों को दर्शाते हुए लोगों का मार्गदर्शन करती हुई एक बहुत ही खूबसूरत रचना... 👏
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