Tuesday, 10 September 2019

परिवार की जिम्मेवारी उठाने वाला सदस्य
अक्सर तन्हा और उपेक्षित क्यूँ होता है...😒

#SwetaBarnwal 
खामोशियां ही बेहतर है जीवन में
लफ़्ज़ों से अक्सर रिश्ते टूट जाते हैं... 😒

#SwetaBarnwal 

Monday, 12 August 2019

कामयाबी...

कल तक जो लोग सीधे मुह बात नहीं करते थे
पीठ पीछे हमारी आलोचनाएं किया करते थे
लड़की होने का एहसास कराया करते थे
कैसे कहती उस वक़्त लड़की हूँ अपाहिज़ नहीं
मेरे माता पिता को तिरस्कृत किया करते थे
जैसे बेटी को शिक्षा देना कोई अपराध हो
पग पग पर जमाने ने कांटे बिछाए
हर मोड़ पर मुझे नीचा दिखाया
और आज लोगों के सुर ही बदल गए
सब को मुझमे अपनी बेटी नज़र आने लगी
मेरे माता पिता लोगों के लिए आदर्श हो गए
हर एक की ज़ुबान पर मेरा नाम ठहर सा गया
सच ही तो कहते हैं लोग
गरीबों से नज़दीक का रिश्ता भी छुपाते हैं लोग
और जो कामयाब हो जाओ तो दूर का रिश्ता भी बताते हैं लोग... 

Tuesday, 23 July 2019

मइया अम्बे... 🙏🏼

मेरी मइया बड़ी प्यारी
उनकी सुरत बड़ी न्यारी
करे जो शेर की सवारी
जिनकी महिमा बड़ी भारी
हो मइया अम्बे

सबका बेड़ा पार लगा दे
दुखियों के जो दुख हर ले
भक्ति भाव से जो कोई ध्यावे
उसके हर दर्द दूर हो जावे
हो मइया अम्बे

बांझन की झोली तु भर दे
अंधन को ज्योति तु दे दे
जो स्त्री तेरा ध्यान लगावे
अखंड सौभाग्य का वर वो पावे
हो मइया अम्बे

निर्बल को संबल तु दे दे
अंधियारे को रौशन तु कर दे
भले बुरे का ज्ञान करादे
जीवन में खुशियाँ तु भर दे
हो मइया अम्बे

तेरी शरण जो कोई आए
रोग दोष जाके निकट ना आवे
भव सागर से पार लगा दे
तेरी महिमा कोई पार ना पावे
हो मइया अम्बे

दुष्टों का संहार करे तु
दुर्बल का उद्धार करे तु
तुझसे बड़ा ना कोई सानी
तु है जग की कल्याणी
हो मइया अम्बे

मेरी मइया बड़ी प्यारी
उनकी सुरत बड़ी न्यारी
करे जो शेर की सवारी
जिनकी महिमा बड़ी भारी
हो मइया अम्बे

#SwetaBarnwal 

Monday, 22 July 2019

सावन...

लौटा दे कोई मुझको मेरे बचपन का सावन
वो मइया की लोरी वो बाबा की गोदी
वो पोखर वो बारिश की ताल तलइया
लौटा दे कोई मुझको वो मेरे घर का आँगन

खेलूं मैं फ़िर से वो बुढ़िया कबड्डी
सखियों के संग फ़िर से दौड़ लगाऊँ
बारिश के पानी में अपनी भी नाव दौड़ेगी
हर ओर होगा खुशियों का आलम

लौटा दे कोई मुझको मेरे बचपन का सावन

खूबसूरत सपनों से भरी हो अपनी ज़िंदगी
सुनुं फिर से वही राजा रानी की कहानी
सुना के सुलाए जिसे दादी नानी की ज़ुबानी
दोहराऊँ फ़िर से वही हसीन ज़िंदगानी

लौटा दे कोई मुझको मेरे बचपन का सावन

हर रोज खलिहान में लगे दोस्तों का डेरा
ना खोने का डर हो ना हो किसी गम ने घेरा
बांध पतंग मे डोर हवा संग बातें करते
गिरते संभलते यूँ ही अपनी मस्ती में जीते

लौटा दे कोई मुझको मेरे बचपन का सावन

बाग में झूलुं डाल आम के पेड़ों पे झूले
कहकहे लगाऊँ सुन के कोयल के बोल सुरीले
मइया निढाल हो अपनी ले के बलैय्या
दुआओं से सबके सवारूं अपना जीवन

लौटा दे कोई मुझको मेरे बचपन का सावन

बारिश के पानी में छपा छैय्या करना
नदी की धार के संग दूर जा निकलना
सर्दी लगने पर माँ की डांट के साथ तेल की मालिश
मिटा दे ज़िंदगी की हर दर्द और तपिश
छुप छुप कर मोहल्ले की औरतों की बातें सुनना
अपनी प्रशंसा होने पर खिलखिला कर हंसना

लौटा दे कोई मुझको मेरे बचपन का सावन...

वो झिलमिल सितारों का आँगन
वो रिमझिम बरसता सावन
वो मइया का प्यार भरा आँचल
वो बाबा की प्यार भरी डांट
वो भाई बहनों की अटखेलियाँ
वो जादू की झप्पी वो सखी सहेलियाँ

लौटा दे कोई मुझको मेरे बचपन का सावन...


#SwetaBarnwal



Saturday, 20 July 2019

औरत...

बहुत जी लिया अबला बन कर
अब ना कोई अत्याचार सहुंगी
भर कर क्रोध की अग्नि इस सीने में
अब अपनी बातों से मैं अंगार भरूँगी
बंद करो ये कहना कि
महाभारत की वजह द्रौपदी थी
सच तो ये था कि
युधिष्ठिर की अय्याशी ने उसे लाचार किया
पांच पतियों की पत्नी हो कर भी
भरी सभा मे लुट रही थी वो
बहुत डाल लिए सच पर पर्दा
अब मैं सच्चाई की आवाज़ बनूंगी
लूटती आई है सदियों से ये औरतें
लक्ष्मी सरस्वती की इस धरा पर
द्रौपदी का चीरहरण लिखूंगी
बहुत सह लिया जुल्म ओ सितम
अब मेरी कलम हुंकार भरेगी
पुत्र की कामना मे कोख में मार डालते हैं पुत्री को
इस अन्याय के विरुद्ध
अब एक औज़ार बनूंगी
बेटियाँ घर से भाग जाती है तो
बाप की पगड़ी उछल जाती है
और जब बेटा
किसी के घर की इज़्ज़त लूट ले जाता है तो
ख़ामोश रह जाते हैं लोग
ऐसे दोगले समाज और न्याय के ठेकेदारों के लिए
एक सवाल बनूंगी
नही देनी अब कोई अग्नि परीक्षा
ना शतरंज पे बिछी बिसात बनूंगी
नहीं रहूंगी अब चुप ना ही अन्याय सहुंगी
पड़ी जरूरत अगर कभी तो
दुर्गा बन दुष्टों का संहार करूंगी...


#SwetaBarnwal 

Sunday, 7 July 2019

अब मैं अपने अंदाज़ में जीने लगी हूँ...

ऐसा नहीं था कि मैं उससे प्यार नहीं करती थी और ऐसा भी नहीं था कि मैं उसके बिना जी नहीं सकती. शादी के २५ सालों के दौरान हमारा रिश्ता ठंढे बस्ते में चला गया था. बीतते वक़्त के साथ हम एक दूसरे की मोहब्बत तो नहीं, हाँ शायद आदत बन कर रह गए थे. हम दोनों को ही एक दूसरे के जज़्बातों की परवाह नहीं रह गई थी. उसने कभी मेरी जिम्मेदारियों का बोझ नहीं उठाया और ना ही मैं कभी उस पर बोझ बन कर रहना चाहती थी. हाँ, उन्हें हमारे बच्चों से बहुत प्यार था, शायद यही एक वजह थी जो हमारे वैवाहिक रिश्ते को इतने सालों तक ढोते रही और हमे एक सूत्र में बांधे रखा.
चरित्र मे उसके कोई खोट ना था पर अपनी पत्नी यानि की मुझपर विश्वास रत्ती भर भी ना था. बहुत चाहा मैंने कि उसका ये मुझ पर अविश्वास ख़त्म हो जाए पर वक़्त के साथ ये परवान चढ़ता गया. उसमें शायद कोई ऐसी बुराई नहीं थी जो हमारे रिश्ते में आ रहे दरार की वजह बनती है पर उसका अविश्वास, अनर्गल आरोप, हर बात पर मेरे चरित्र का हनन इन सब ने मिल कर हमारे रिश्ते को निगल लिया. उसने ख्वाब में भी कभी मेरा ऐतबार नहीं किया. वो अपने स्त्री पुरुष हर तरह के दोस्त और सहकर्मियों का ज़िक्र किया करता था मुझसे. इस तरह वो अपनी ईमानदारी का सबूत दिया करता था. पर कभी भूले से भी मेरे मुह से किसी पुरुष मित्र या सहकर्मी का नाम निकल जाए तो शक़ की घंटी तुरंत उसके दिमाग में बजने लगती थी. वैसे इसमे उसकी कोई गलती नहीं थी. गलती तो इस समाज और उसके घटिया सोच की है जो पहले तो औरतों को घर की दहलीज़ पार करने नहीं देती थी और आज जब औरतों ने दुनिया में अपना मकाम बना लिया है तब भी उसके पैरों मे अनजानी सी बेड़ियाँ हर वक़्त रहती है बंधी. बची खुची कसर उन्हें मिली परवरिश ने पूरी कर दी. उसके माँ बाप ने कभी मुझे बहु का मान नहीं दिया, हर वक़्त अपनी जली कटी और अश्लील शब्दों से मेरे किरदार और चरित्र का हनन करते.
इस रिश्ते में घुटन सी होने लगी थी, पर कुछ था जो शायद अब भी शेष था हमारे बीच और वो था सबकुछ ठीक होने की उम्मीद. मेरी इन झंझावतों से भरी ज़िंदगी में ऐसा नहीं था कि मुझे कोई चाहने वाला ना मिला था, पर मुझे अपनी हदें मालूम थी और ये भी समझती थी कि हर मर्द एक जैसे ही होते हैं. औरत सबके लिए सिर्फ़ मन बहलाने का जरिया मात्र है. पर हाँ इस मतलबी दुनिया में कुछ बहुत अच्छे दोस्त भी मिले थे जिसने मुझे जीना सिखाया, ख़ुद से लड़ना सिखाया, अपने अंदर के तूफानों को दबाना सिखाया. नहीं नहीं इन दोस्तों के बारे में मैंने उसे कभी कुछ नहीं बताया. अतीत में किए गए ईमानदारी के परिणाम देख अब उसे दुहराने की गलती क्यूँ करती भला. मैंने कभी कुछ ना छुपाया, जो भी था अतीत मेरा, भला या बुरा हर किस्सा सुनाया बदले में सिवाय गाली के कुछ ना मिला. हर वक़्त मेरा मोबाइल खंगालना, मैसेज देखना, छोटी छोटी बातों पर हंगामा करना, मेरी इज़्ज़त को तार तार करना, इसलिए निकाल फेंका अपने अंदर के ईमानदारी के किड़े को.
सच कहूँ तो मुझे मेरे अस्तित्व की पहचान मेरे उन्हीं दोस्तों ने कराई. मेरे अंदर मृत पड़े एहसास को उनलोगों ने ही जगाया. मैं अब अपने आप को संवारने लगी, अपने तरीकों और शौख को बदलने लगी अब मैं ख़ुद के लिए भी जीने लगी और वो कहते हैं तुम्हारे तो कई यार हैं, कई चाहने वाले हैं, तुम्हें मेरी क्या जरूरत. तुम्हारी तो हर रात रंगीन होती होगी और मैं मुस्कुरा कर सहमति मे हाँ बोल जाती हूँ सिर्फ़ इसलिए कि अब मैं अपने अंदाज़ में जीने लगी हूँ. कब तक सफ़ाई देती रहूँ अनकहे इल्ज़ामों का कि अब मैं हर ज़हर पीने लगी हूँ...

क्या इस स्त्री ने सही किया, अपना जवाब comment box मे जरुर दें...

(एक स्त्री के वर्चस्व की लड़ाई)

#SwetaBarnwal 

ऐ विधाता...!

 ऐ विधाता...! ना जाने तू कैसे खेल खिलाता है...  किसी पे अपना सारा प्यार लुटाते हो, और किसी को जीवन भर तरसाते हो,  कोई लाखों की किस्मत का माल...