Monday, 22 July 2019

सावन...

लौटा दे कोई मुझको मेरे बचपन का सावन
वो मइया की लोरी वो बाबा की गोदी
वो पोखर वो बारिश की ताल तलइया
लौटा दे कोई मुझको वो मेरे घर का आँगन

खेलूं मैं फ़िर से वो बुढ़िया कबड्डी
सखियों के संग फ़िर से दौड़ लगाऊँ
बारिश के पानी में अपनी भी नाव दौड़ेगी
हर ओर होगा खुशियों का आलम

लौटा दे कोई मुझको मेरे बचपन का सावन

खूबसूरत सपनों से भरी हो अपनी ज़िंदगी
सुनुं फिर से वही राजा रानी की कहानी
सुना के सुलाए जिसे दादी नानी की ज़ुबानी
दोहराऊँ फ़िर से वही हसीन ज़िंदगानी

लौटा दे कोई मुझको मेरे बचपन का सावन

हर रोज खलिहान में लगे दोस्तों का डेरा
ना खोने का डर हो ना हो किसी गम ने घेरा
बांध पतंग मे डोर हवा संग बातें करते
गिरते संभलते यूँ ही अपनी मस्ती में जीते

लौटा दे कोई मुझको मेरे बचपन का सावन

बाग में झूलुं डाल आम के पेड़ों पे झूले
कहकहे लगाऊँ सुन के कोयल के बोल सुरीले
मइया निढाल हो अपनी ले के बलैय्या
दुआओं से सबके सवारूं अपना जीवन

लौटा दे कोई मुझको मेरे बचपन का सावन

बारिश के पानी में छपा छैय्या करना
नदी की धार के संग दूर जा निकलना
सर्दी लगने पर माँ की डांट के साथ तेल की मालिश
मिटा दे ज़िंदगी की हर दर्द और तपिश
छुप छुप कर मोहल्ले की औरतों की बातें सुनना
अपनी प्रशंसा होने पर खिलखिला कर हंसना

लौटा दे कोई मुझको मेरे बचपन का सावन...

वो झिलमिल सितारों का आँगन
वो रिमझिम बरसता सावन
वो मइया का प्यार भरा आँचल
वो बाबा की प्यार भरी डांट
वो भाई बहनों की अटखेलियाँ
वो जादू की झप्पी वो सखी सहेलियाँ

लौटा दे कोई मुझको मेरे बचपन का सावन...


#SwetaBarnwal



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