ना जाने क्यूँ...!
एक ख़ामोशी सी छा गई है हमारे बीच
वजह क्या है शायद नही पता
या फिर यूँ कहो कि सबकुछ पता है
ठीक करना चाहूँ सब कुछ
पर शायद होनी को मंज़ूर कुछ और है
मौन साध रखा है हम दोनों ने ही
या फिर नाराज़गी का कोई आलम है
ना जाने क्यूँ अब वो सुहानी शाम नहीं होती...
तुम पूछने आओ मेरी उदासी का सबब
अब वैसी कोई बात नहीं होती
क्यूँ परेशान हो प्रिये कुछ कह भी दो
खींच लो कभी मुझे अपनी बाहों में
सहला जाओ कभी अपनी प्यारी बातों से
मेरे नासूर हो रहे ज़ख्मों को जो ज़िन्दगी ने दिए
ना जाने क्यूँ अब वैसी मुलाकात नहीं होती...
आज भी जब मैं अकेली होती हूँ
तेरी यादों का लम्हा मेरे साथ होता है
गुदगुदाती है हवाएं भी
यूँ लगता है जैसे एहसास भर लाई हो तुम्हारा
उगते चाँद को देख मुस्कुरा लेती हूँ
तेरे साथ बिताए पल को जी लिया करती हूँ
यादों में तुम मेरे हर पल होते हो
पर ना जाने क्यूँ अब तुम साथ नहीं होते
ना जाने क्यूँ अब वो हसीन रात नहीं होती...
ना जाने क्यूँ अब वो नज़र नहीं होती
जी भर कर देखा करती थी जो मुझे
चेहरे पर ना चाह कर भी उदासी छा जाती है
लाख छुपाऊँ पर ये आँसू दगा दे जाते हैं
हंसना चाहूँ पर हंस भी ना पाऊँ
कभी ना सोचा था ऐसे मोड़ आएंगे
रोना भी जरूरी होगा और आंसू छुपाने भी होंगे
ना जाने क्यूँ अब वो बरसात नहीं होती...
घुट घुट कर जी रही हूँ ज़िंदगी मैं अपनी
और पी रही हूँ अपनी ही उदासी को घूंट घूंट में
आइने में देखूं तो ख़ुद को ख़ुद से बेज़ार पाऊं
बहुत ही घुटन सी महसूस होती है इस सन्नाटे में
अपनी ही सांसों की आवाज़ सुनाई दे जाती है इस वीराने में
दिल को चीर कर रख देती है ये रात की ख़ामोशी
ना जाने क्यूँ अब वो तारों वाली रात नहीं होती...
#SwetaBarnwal
एक ख़ामोशी सी छा गई है हमारे बीच
वजह क्या है शायद नही पता
या फिर यूँ कहो कि सबकुछ पता है
ठीक करना चाहूँ सब कुछ
पर शायद होनी को मंज़ूर कुछ और है
मौन साध रखा है हम दोनों ने ही
या फिर नाराज़गी का कोई आलम है
ना जाने क्यूँ अब वो सुहानी शाम नहीं होती...
तुम पूछने आओ मेरी उदासी का सबब
अब वैसी कोई बात नहीं होती
क्यूँ परेशान हो प्रिये कुछ कह भी दो
खींच लो कभी मुझे अपनी बाहों में
सहला जाओ कभी अपनी प्यारी बातों से
मेरे नासूर हो रहे ज़ख्मों को जो ज़िन्दगी ने दिए
ना जाने क्यूँ अब वैसी मुलाकात नहीं होती...
आज भी जब मैं अकेली होती हूँ
तेरी यादों का लम्हा मेरे साथ होता है
गुदगुदाती है हवाएं भी
यूँ लगता है जैसे एहसास भर लाई हो तुम्हारा
उगते चाँद को देख मुस्कुरा लेती हूँ
तेरे साथ बिताए पल को जी लिया करती हूँ
यादों में तुम मेरे हर पल होते हो
पर ना जाने क्यूँ अब तुम साथ नहीं होते
ना जाने क्यूँ अब वो हसीन रात नहीं होती...
ना जाने क्यूँ अब वो नज़र नहीं होती
जी भर कर देखा करती थी जो मुझे
चेहरे पर ना चाह कर भी उदासी छा जाती है
लाख छुपाऊँ पर ये आँसू दगा दे जाते हैं
हंसना चाहूँ पर हंस भी ना पाऊँ
कभी ना सोचा था ऐसे मोड़ आएंगे
रोना भी जरूरी होगा और आंसू छुपाने भी होंगे
ना जाने क्यूँ अब वो बरसात नहीं होती...
घुट घुट कर जी रही हूँ ज़िंदगी मैं अपनी
और पी रही हूँ अपनी ही उदासी को घूंट घूंट में
आइने में देखूं तो ख़ुद को ख़ुद से बेज़ार पाऊं
बहुत ही घुटन सी महसूस होती है इस सन्नाटे में
अपनी ही सांसों की आवाज़ सुनाई दे जाती है इस वीराने में
दिल को चीर कर रख देती है ये रात की ख़ामोशी
ना जाने क्यूँ अब वो तारों वाली रात नहीं होती...
#SwetaBarnwal
No comments:
Post a Comment