Friday, 13 March 2020

ख़ास हूँ मैं...

कैसे कह दूँ अब जीने की चाह नहीं इस दिल में,
ना जाने कितने ही लोगों के जीने की वज़ह हूँ मैं...
कैसे रोक लूँ अपनी सासों को मैं,
ना जाने कितने ही दिलों की धड़कन हूँ मैं,
कैसे कह दूँ कि अब ज़िंदगी से हार बैठी हूँ मैं,
जबकि कितने ही लोगों की उम्मीद हूँ मैं,
ख़ुद के लिए एक मुट्ठी ख़ुशी भी ना ख़रीद पाई कभी,
फ़िर भी ना जाने कितनों के ख़ुशी की वज़ह हूँ मैं,
होंठों पर खोखली सी हंसी समेटे हुए हरदम,
ना जाने कितने ही चेहरों की मुस्कान हूँ मैं,
मर चुका है दिल से सारे अह्सास जिसके,
औरों के जीवन में महकती हूँ मैं अह्सास बनके,
कुछ भी तो नहीं है ख़ास मुझमे,
फ़िर भी ना जाने कितनों के लिए ख़ास हूँ मैं...


#SwetaBarnwal


2 comments:

Anonymous said...

सच में बहुत खास हैं आप,
मीठा मीठा सा एहसास हैं आप,
एक बार जो देख लूँ छवि आपकी,
लगता है मेरे आस-पास हैं आप...

आपका शुभचिंतक...

Anonymous said...

आपकी कविताओं का एक अनवरत पाठक...
बहुत ही अच्छी लगती है मुझे आपकी कविताएं...

ऐ विधाता...!

 ऐ विधाता...! ना जाने तू कैसे खेल खिलाता है...  किसी पे अपना सारा प्यार लुटाते हो, और किसी को जीवन भर तरसाते हो,  कोई लाखों की किस्मत का माल...