Tuesday, 3 December 2019

जरा चाय बना देना...

ए...! चाय बना देना,
ए..! खाना निकाल देना,
ए..! देखो बगल की चाची आई है, प्रणाम करो,
ए..! दरवाजे के सामने ऐसे क्यूँ खड़ी हो,
बस कुछ इन्हीं शब्दों का आदि हो चुके थे आशा के कान और वो यही सोचती, "क्या सबकी सासु माँ ऐसे ही बात करती हैं"
आशा एक पाढ़ी लिखी और समझदार लड़की थी जो अभी अभी तो मायके से ससुराल तक का सफ़र तय कर आई थी दिल में कई अरमान लिए. बड़े जतन से सबका मान रखती. पर सास का "ए" से संबोधन उसे बहुत खलता, क्या जाता अगर सासु माँ उसे बेटी, बहु या फिर उसके नाम से ही बुला लेती .
फ़िर एक दिन,
ए...! जरा चाय बना देना,
आशा ने सास की बात को अनसुना कर अपने काम मे लगी रही, शाम को पति के घर आते ही सास ने उसकी शिकायत की. आशा भोली और अंजान बनी रही. सास ने अपने वाक्य दुहराया कि शाम को उन्होंने आशा को कहा था कि
"ए...! जरा चाय बना देना"
पर वो अनसुना करके चली गई, तभी आशा ने तुरंत कहा कि यहां "ए" कौन है...?
उसके पति को तुरंत उसकी बात समझ आ गई और उन्हों अपनी माँ को समझाया कि वो आशा को उसके नाम या बेटी या बहु से बुलाया करे ना कि "ए" कह कर, आखिर वो भी तो उसकी बेटी जैसी ही है. सासु माँ को जैसे ही बात समझ आई, उन्हों ने आवाज लगाई...
"बेटी आशा..! जरा चाय बना देना..."
और ये सुन सब खिलखिला कर हंसने लगे...

#SwetaBarnwal 

श्रृंगार...

कैसे तेरा श्रृंगार करूँ मैं बिटिया,
कैसे तुझसे लाड लड़ाऊं मैं बिटिया,
हर मोड़ पर दुश्मन बैठे हैं
कैसे तुझको सबसे बचाऊं मैं बिटिया,
ना जाने कितनी निर्भया लूटी गई,
और ना जाने कितनी जल कर राख हुई,
किस किस से आख़िर कैसे बचाऊं तुझको,
हर कदम पे ज़ालिम बैठे हैं,
माँ हूँ मैं तेरी हर आहट पे डर सी जाती हूँ,
कौन है अपना और कौन पराया
मैं सबसे खौफ़ खाती हूँ,
ना जाने कब कौन सी नजर उठे तेरी ओर,
ना जाने किसकी हैवानियत जाग उठे,
सोचूँ मैं ये खड़े खड़े
ना जाने किस मिट्टी से विधाता ने इसे गढ़े,
आख़िर क्यूँ नित नए हैवानियत के खेल खेल रहा है कोई,
ना जाने क्यूँ बेटियों की बोटियां नोच रहा है कोई,
क्या दोष था उन मासूम बच्चियों का,
क्या गुज़री होगी उनके माँ बाप पे,
कैसे उन्होंने रात गुज़ारी होगी,
कैसे अपनी बेटी की बोटियां समेटी होंगी,
धरती का सीना भी फट जाता होगा,
जब कोमल कलियां कुचली जाती होंगी,
हर नज़र से कैसे बचाऊं तुझको,
जी चाहता है दुनिया से छुपा लूँ तुझको,
अपने आँचल के छांव मे समेट कर,
किसी दूसरे जहां मे ले जाऊँ तुझे,
हर नज़र यहाँ पर गंदी है,
हर छुअन यहाँ की भद्दी है,
कैसे ये बात अभी मैं समझाऊं तुझे,
छोटी सी है तू अभी, नादान उमर है तेरी,
अब नहीं कृष्ण आयेंगे द्रौपदी की लाज बचाने को,
ना रचेगा तेरे लिए अब इतिहास कोई,
तुझे ख़ुद ही रण चंडी बन जाना होगा,
हैवानों को उनकी औकात बतानी होगी,
आ गया है वक्त कुछ कर गुजरने की,
ऐसी नीति बनानी होगी जो दहल उठे दुष्टों का सीना,
बढ़े हाथ जो बेटियों को छूने
कुचल उन्हें आगे बढ़ जाना होगा,
बंद करो ये मोमबत्तियां जलाना,
नही चाहिए अब कोई झूठी हमदर्दी,
ये वीरों की धरती है कोई हिजड़ों की ये बस्ती नहीं,
यहां रामायण और महाभारत छिड़ जाते हैं
जो नारी की स्मिता पे बुरी नजर किसी ने डाली,
उठा लाओ विष्णु का सुदर्शन
और छिन लो उन मर्दों से मर्द होने का दंभ
जिसने छीना है हमारी बेटियों से उनकी आज़ादी,
तभी तो कर पाएगी हर माँ अपनी बेटियों का श्रृंगार,
वर्ना खत्म हो जाएगा श्रृंगार का अस्तित्व
और ये सृष्टि हो जाएगी विरान...


#SwetaBarnwal

चाहत...

तुझसे ना जाने क्यूँ ऐसी चाहत हुई है,
हर पल तेरे आने की जैसे आहट हुई है,
तेरी याद मे ख़ुद को भी भूल जाने लगी हूँ,
तेरे ही ख्वाबों मे अब खोने लगी हूँ,
हर शय पे तेरा ही नाम लिखती और मिटाती हूँ,
तुझे चाहती थी अब पूजती भी हूँ,
है नाराज़ ख़ुदा भी अब मुझसे,
तेरे सज़दे मे जो सर झुकाने लगी हूँ,
बड़ी ही बेरुखी सी गुज़र रही थी जिंदगी अपनी,
तुझे पाकर अब जैसे मुस्कराने लगी है,
यूँ तो कोई शिकायत ना थी जिंदगी से मुझको,
पर कोई ख्वाहिश भी ना थी जीने की मुझको,
तू मिला तो जैसे खिल उठी हूँ मैं,
तेरे इश्क में अब मैं संवरने लगी हूँ,
तेरा साथ पाकर मुझे भी करार आने लगा है,
चाहत में तेरी इस जिंदगी से
मैं राहत के कुछ पल चुराने लगी हूँ,
तुझसे हर राज़ दिल के बताने लगी हूँ,
ना जाने तुझे क्यूँ इतना चाहने लगी हूँ,
तेरे इश्क के रंग में मैं जब से रंगी,
जीवन में हर रंग मेरे खिलने लगे,
तेरे इश्क का मुझ पर हुआ यूं असर है
दुनिया जहां मैं भुलाने लगी हूँ,
बड़ी उलझनें हैं बड़ी बेबसी है,
उल्फत मे मेरी जान ऐसे फंसी है,
तुझसे है चाहत तुझी से हर हसरत,
तेरे प्यार मे मैं यूँ दीवानी हुई,
जैसे राधा हो गई श्याम की...

#SwetaBarnwal

Saturday, 30 November 2019

मेरा दामाद लाखों मे एक...

नई नवेली दुल्हन आशा अपने दिल में कई सारे अरमान लिए अपने पति संग ससुराल की दहलीज पे पांव रखी. ससुराल में सास, ससुर, ननद और देवर और खुब प्यार करने वाले पति, बस एक प्यारा सा परिवार. पति पत्नी दोनों ही प्राइवेट फर्म मे काम करते थे. सुबह उठते ही घर के कामों को जल्दी जल्दी निपटा कर सभी के नाश्ते और खाने का प्रबंध कर पति के साथ दफ्तर के लिए निकल जाती. पूरे दिन के भाग दौड़ के बाद आशा काफी थक सी जाती थी. घर आने के बाद किसी और काम की हिम्मत नहीं बचती थी उसमें. बावजूद घर में सबका ख्याल रखती थी. घर के कामों में सिवाय उसके पति राजेश के किसी और ने ना उसकी मदद करनी चाही और ना ही आशा ने किसी से कभी कुछ कहा.
अपने माँ पापा की लाडली और पढ़ाई मे व्यस्त रहने के कारण घर के कामों में कोई खास रुचि नहीं थी उसकी और ना ही कोई भार था उसपे. और यहां ससुराल आते ही घर की सारी जिम्मेवारी उसके सर आ गई. सास को अपने वो फूटी आंख ना सुहाती, वज़ह उनके बेटे राजेश का रसोई और घर के अन्य कामों में आशा का हाथ बटाना. आशा खुद एक working lady होने की वज़ह से कई बार चाहा कि घर में कोई maid रख ले, पर सास ससुर ने इसकी अनुमति नहीं दी. राजेश को भी अपनी माँ की खरी खोटी सुननी पड़ती थी. अपनी माँ का दुलारा बेटा आज नाकारा बेटा साबित हो रहा था. धीरे धीरे घर का माहौल बिगड़ने लगा. आशा के सारे सपनों पे जैसे पानी फिर गया. अचानक घर में एक नई खुशी का आगमन हुआ. आशा माँ बनने वाली थी, सारे बहुत खुश थे. लेकिन इस खुशी के साथ कई परेशानियां भी साथ आ गई. आशा के स्वास्थ्य पे असर पड़ने लगा. सबकी खुशी देख आशा ने एक बार फिर अपनी बात सबके सामने रखी कि घर में एक maid रख ली जाए. मगर इस बार भी वही हुआ, उसकी बात को सास ने मानने से इंकार कर दिया. आशा ने किसी तरह से ये दिन भी गुज़ार लिए.
फिर वो दिन आ गया जिस दिन का सबको बेसब्री से इंतजार था. आशा बहुत जि़द करके अपने मायके चली गई और वहां उसने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया. यहां वो पुरसुकुन से रह रही थी, मगर कितने दिन. आख़िर वो दिन भी आ गया जब उसे ससुराल जाना था. मायके में तो माँ पापा ने उसे सर पर बिठा रखा था. मगर ससुराल जाते ही फिर से वही भाग दौड़ की जिंदगी.
दिन गुज़रते गए और एक दिन उसकी ननद ब्याह कर अपने ससुराल चली गई. सभी बहुत खुश थे. दिन जैसे पंख लगा कर उड़ रहे थे. आशा का बेटा अब 1 साल को होने को था. उसके पहले जन्मदिन पर ननद अपने मायके आई. आशा की सासु माँ की ख़ुशी का ठिकाना ना था. आख़िर ख़ुश क्यूँ ना होती, उनके दामाद ने घर में दो maid रख दिया था, घर के छोटे मोटे कामों में हाथ बंटाते, हर weekend पे outing पे ले जाते, साथ वक्त बिताते, उसकी हर ख्वाहिश पूरी करते, उनकी बेटी को उसकी सासु माँ ने पलकों पर बिठाया था.
आशा की सासु माँ अपने पड़ोसियों से ये कहते नहीं थक रही थी आज
"मेरा दामाद लाखों मे एक..."
और आशा अपने आंचल से आँखों को पोंछ बेटे के जन्मदिन की तैयारी में लग गई...


*जिस मापदंड पे दामाद लाखों मे एक हो गया आख़िर उसी मापदंड पे बेटा नाकारा कैसे हो गया. ये दोहरा मापदंड आख़िर क्यूँ... 😢
आख़िर बहु और बेटी मे ऐसा फर्क़ क्यूँ... 🙁
#SwetaBarnwal 

Saturday, 23 November 2019

जिंदगी की किताब...

आज पलट कर देखा जो जिंदगी की किताब को,
तेरे साथ गुज़रा हर पल, हर लम्हा याद आ गया,

याद आई तेरी वो बातेँ तुझसे हर मुलाकातें,
दिल से दिल जुड़ा था हमारा,
प्यार जहां से जुदा था हमारा,
मुश्किल था बहुत एक दूजे के बिन जी पाना,
ख्यालों में था हमारा आना जाना,
तेरे ही ख्वाबों मे गुज़रती थी रातें हमारी,

आज पलट कर देखा जो जिंदगी की किताब को,
तेरे साथ गुज़रा हर पल, हर लम्हा याद आ गया,

वो छोटी छोटी बातों मे रूठना मनाना,
वो एक दूसरे के सीने से लग हर ग़म भूल जाना,
हमारी हर चाहत बस एक दूसरे का साथ चाहती थी,
खुशियाँ एक दूसरे का बेपनाह चाहती थी,
एक दूसरे की झलक से दिल को सुकून मिलता था,
बिन कहे दिल के हर जज़्बात समझ लेते थे,

आज पलट कर देखा जो जिंदगी की किताब को,
तेरे साथ गुज़रा हर पल, हर लम्हा याद आ गया...

ना जाने फिर कैसा मोड़ आया जिंदगी में,
जो दिल के सबसे करीब था
वो ही हाथों की लकीरों मे ना था,
किसी को खूबियों से प्यार होगा,
हमें तो खामियों से भी प्यार था,
फिर भी ना जाने क्यूँ क़िस्मत पे ऐतबार ना था,
जो दिल के करीब था वही नजरों से दूर हो गया,

आज पलट कर देखा जो जिंदगी की किताब को,
तेरे साथ गुज़रा हर पल, हर लम्हा याद आ गया...

#SwetaBarnwal
कटा हुआ पेड़ कभी छांव नहीं देता है ,
हद से ज्यादा उम्मीद घाव ही देता है...

#SwetaBarnwal 

Friday, 22 November 2019

ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...

देखते ही देखते मैं इतनी बड़ी हो गई,
छूटा बचपन, घर आंगन और सखियां,
छूटे गली मोहल्ले और खेल खिलौने,
छूटा मां का आंचल और बाबा की घुड़की
छूट गया वो छोटे भाई बहन का प्यार,

ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...

छूटा वो गुड्डे गुड़ियों का ब्याह रचाना,
छूट गई वो हंसी ठिठोली,
वो संगी साथी, वो दोस्तों की टोली,
वो खुल कर हंसना और जोर से रोना,
खो गई वो मस्ती वो बचपन की मासूमियत,
बेवजह रोना और रूठना मनाना

ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...

खेल कूद और भाग दौड़ को भूल
काम काज में मैं दक्ष हो गई
बेतरतीब और लापरवाह सी लड़की
आज चाल ढाल में परिपूर्ण हो गई,
संस्कारों की जैसे लड़ी हो गई,

ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...

बेरुखी सी गुमसुम और मुरझाई सी,
रिश्तों और जिम्मेवारियों के बोझ तले,
अपने ही सपनों का गला घोंटते,
जीवन पतंग की अनदेखी सी डोर हो गई,

ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...

मैं मिट्टी की मूरत सी एक बेजान सूरत सी,
किसी और के हाथों की कठपुतली सी,
दूसरे के घर की इज्ज़त उनका मान हो गई,
मैं पिंजरे में कैद ख़ुद से ही अनजान हो गई,

ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...

अपनों से दूर अपने आप से ज़ुदा
ना जाने कब मैं सबके लिए पराई हो गई,
चहकना भूल गई, खिलखिलाना भूल गई,
पिंजरे मे कैद एक मैना सी
ना जाने क्यूँ दूर गगन मे उड़ना भूल गई,

ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...

जिंदादिली से जिया करते थे हम भी कभी,
धुंधली सी ख्वाबों की दुनिया थी हमारी भी,
आज तो बस जिंदा है जिंदगी खो गई है,
ना जाने क्यों हमारी हर ख़ुशी खो गई है,

ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...

दिल करता है तोड़ के सारे बंधन
गिरा दूँ सारे रस्मों रिवाज की दीवार
खिलखिला कर हंसुं, उड़ुं आसमान में,
अपने अरमानों की दुनिया मैं फिर से सजाउं,
फिर से बन जाऊँ मैं बेपरवाह, मदमस्त सी,
फिर से जी लूँ अपनी मर्जी की जिंदगी,
काश! कोई लौटा दे मुझे मेरे हिस्से की ख़ुशी,
ना जाने क्यों मैं इतनी बड़ी हो गई....

ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...

#SwetaBarnwal

ऐ विधाता...!

 ऐ विधाता...! ना जाने तू कैसे खेल खिलाता है...  किसी पे अपना सारा प्यार लुटाते हो, और किसी को जीवन भर तरसाते हो,  कोई लाखों की किस्मत का माल...