देखते ही देखते मैं इतनी बड़ी हो गई,
छूटा बचपन, घर आंगन और सखियां,
छूटे गली मोहल्ले और खेल खिलौने,
छूटा मां का आंचल और बाबा की घुड़की
छूट गया वो छोटे भाई बहन का प्यार,
ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...
छूटा वो गुड्डे गुड़ियों का ब्याह रचाना,
छूट गई वो हंसी ठिठोली,
वो संगी साथी, वो दोस्तों की टोली,
वो खुल कर हंसना और जोर से रोना,
खो गई वो मस्ती वो बचपन की मासूमियत,
बेवजह रोना और रूठना मनाना
ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...
खेल कूद और भाग दौड़ को भूल
काम काज में मैं दक्ष हो गई
बेतरतीब और लापरवाह सी लड़की
आज चाल ढाल में परिपूर्ण हो गई,
संस्कारों की जैसे लड़ी हो गई,
ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...
बेरुखी सी गुमसुम और मुरझाई सी,
रिश्तों और जिम्मेवारियों के बोझ तले,
अपने ही सपनों का गला घोंटते,
जीवन पतंग की अनदेखी सी डोर हो गई,
ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...
मैं मिट्टी की मूरत सी एक बेजान सूरत सी,
किसी और के हाथों की कठपुतली सी,
दूसरे के घर की इज्ज़त उनका मान हो गई,
मैं पिंजरे में कैद ख़ुद से ही अनजान हो गई,
ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...
अपनों से दूर अपने आप से ज़ुदा
ना जाने कब मैं सबके लिए पराई हो गई,
चहकना भूल गई, खिलखिलाना भूल गई,
पिंजरे मे कैद एक मैना सी
ना जाने क्यूँ दूर गगन मे उड़ना भूल गई,
ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...
जिंदादिली से जिया करते थे हम भी कभी,
धुंधली सी ख्वाबों की दुनिया थी हमारी भी,
आज तो बस जिंदा है जिंदगी खो गई है,
ना जाने क्यों हमारी हर ख़ुशी खो गई है,
ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...
दिल करता है तोड़ के सारे बंधन
गिरा दूँ सारे रस्मों रिवाज की दीवार
खिलखिला कर हंसुं, उड़ुं आसमान में,
अपने अरमानों की दुनिया मैं फिर से सजाउं,
फिर से बन जाऊँ मैं बेपरवाह, मदमस्त सी,
फिर से जी लूँ अपनी मर्जी की जिंदगी,
काश! कोई लौटा दे मुझे मेरे हिस्से की ख़ुशी,
ना जाने क्यों मैं इतनी बड़ी हो गई....
ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...
#SwetaBarnwal
छूटा बचपन, घर आंगन और सखियां,
छूटे गली मोहल्ले और खेल खिलौने,
छूटा मां का आंचल और बाबा की घुड़की
छूट गया वो छोटे भाई बहन का प्यार,
ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...
छूटा वो गुड्डे गुड़ियों का ब्याह रचाना,
छूट गई वो हंसी ठिठोली,
वो संगी साथी, वो दोस्तों की टोली,
वो खुल कर हंसना और जोर से रोना,
खो गई वो मस्ती वो बचपन की मासूमियत,
बेवजह रोना और रूठना मनाना
ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...
खेल कूद और भाग दौड़ को भूल
काम काज में मैं दक्ष हो गई
बेतरतीब और लापरवाह सी लड़की
आज चाल ढाल में परिपूर्ण हो गई,
संस्कारों की जैसे लड़ी हो गई,
ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...
बेरुखी सी गुमसुम और मुरझाई सी,
रिश्तों और जिम्मेवारियों के बोझ तले,
अपने ही सपनों का गला घोंटते,
जीवन पतंग की अनदेखी सी डोर हो गई,
ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...
मैं मिट्टी की मूरत सी एक बेजान सूरत सी,
किसी और के हाथों की कठपुतली सी,
दूसरे के घर की इज्ज़त उनका मान हो गई,
मैं पिंजरे में कैद ख़ुद से ही अनजान हो गई,
ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...
अपनों से दूर अपने आप से ज़ुदा
ना जाने कब मैं सबके लिए पराई हो गई,
चहकना भूल गई, खिलखिलाना भूल गई,
पिंजरे मे कैद एक मैना सी
ना जाने क्यूँ दूर गगन मे उड़ना भूल गई,
ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...
जिंदादिली से जिया करते थे हम भी कभी,
धुंधली सी ख्वाबों की दुनिया थी हमारी भी,
आज तो बस जिंदा है जिंदगी खो गई है,
ना जाने क्यों हमारी हर ख़ुशी खो गई है,
ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...
दिल करता है तोड़ के सारे बंधन
गिरा दूँ सारे रस्मों रिवाज की दीवार
खिलखिला कर हंसुं, उड़ुं आसमान में,
अपने अरमानों की दुनिया मैं फिर से सजाउं,
फिर से बन जाऊँ मैं बेपरवाह, मदमस्त सी,
फिर से जी लूँ अपनी मर्जी की जिंदगी,
काश! कोई लौटा दे मुझे मेरे हिस्से की ख़ुशी,
ना जाने क्यों मैं इतनी बड़ी हो गई....
ना जाने कब मैं इतनी बड़ी हो गई...
#SwetaBarnwal
No comments:
Post a Comment