Sunday, 17 November 2019

ये ज़िन्दगी...

ना जाने किस ओर जा रही है ये ज़िन्दगी,
हमारी हो कर हमसे ही मुंह मोड़ रही है ये ज़िन्दगी,
ना जाने कितने ही सपने सजाए थे इन आंखों ने,
आंखों से बस लहु बहा रही है ये ज़िन्दगी,
चाहूं मैं कुछ और रुख कोई और ले रही है ज़िन्दगी,
ना जाने कैसे कैसे खेल खेल रही है ये ज़िन्दगी,
कभी रो रही है कभी रुला रही है ये ज़िन्दगी,
बेबस कर हमें मुस्कुरा रही है ये ज़िन्दगी,
एक हल्की सी मुस्कान के लिए तरसा रही है ये ज़िन्दगी,
अजीब सी कश्मकश में उलझी हुई है ये ज़िन्दगी,
गमों के मझधार में अटकी पड़ी है ये ज़िन्दगी,
भुला कर मेरा वजूद मुंह मोड़ रही है ये ज़िन्दगी,
ख़ुद से ही बेज़ार हो रही है ये ज़िन्दगी,
वक़्त के हाथों से फिसलकर ये लम्हें छूट रहे हैं,
अश्रु की ये धारा हर उम्मीद धो रहे हैं,
दिल के एहसासों को झुलसा रही है ये ज़िन्दगी,
मोहब्बत के धागों को ना जाने क्यूं उलझा रही है ये ज़िन्दगी,
वक़्त के आगे खिलौना बन कर रह गई है ये ज़िन्दगी,
जो कभी मेरी थी आज अनजान बन कर रह गई ये ज़िन्दगी,
आज फिर से एक बार सहम सी गई है ये ज़िन्दगी,
ना जाने अब तक किस वहम में गुजर रही थी ये ज़िन्दगी,
टूट कर रह गया है हर डोर विश्वास का,
ना जाने किस के सहारे गुज़र रही है ये ज़िन्दगी,
मेरी हो कर मुझसे ही दगा कर रही है ये ज़िन्दगी,
बस कुरुक्षेत्र बन कर रह गई है ये ज़िन्दगी,
हर मोड़ पर दम तोड़ रही है ये ज़िन्दगी...


#SwetaBarnwal


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