Sunday, 15 March 2020

जितनी खूबसूरती से लोग रिश्ते बनाते हैं #श्वेता,
उतनी ही शिद्दत से क्यूँ लोग यहां भूल जाते हैं...

#SwetaBarnwal 

बेटा और बेटी...

बेटे की तरह बेटी भी
नौ महीने माँ की कोख में पलते हैं
बेटे की तरह बेटी भी
बाबा की उंगली थाम के चलते हैं,
होती है दोनों की सूरत एक जैसी
होती है दोनों ही मुरत एक जैसी,
बेटे की तरह बेटी भी
माँ की गोद में सोते हैं,
बेटे की तरह बेटी भी
हंसते गाते और रोते हैं,
करते नादानियाँ दोनों एक जैसी
करते मनमानियाँ दोनों एक जैसी,
बेटे की तरह बेटी भी
नाम रौशन करती हैं,
बेटे की तरह बेटी भी
कुल का मान रखती है,
करते अठखेलियाँ दोनों एक जैसी
करते शैतानियाँ दोनों एक जैसी,
बेटा पिता का साया है
तो बेटी माँ की परछाई है,
भला माँ बाप की सेवा में
बेटी कब पीछे आई है,
बेटा अगर गुमान है
तो बेटी भी स्वाभिमान है,
फ़िर भी क्यूँ नहीं होती है
दोनों की किस्मत एक जैसी,
फ़िर भी क्यूँ कोख में ही
खत्म कर दी जाती है इसकी कहानी,.
क्यूँ बेटी के जन्म का मातम मनाते हैं लोग,
क्यूँ उसे बोझ समझ दूर फेंक देते हैं लोग.
बेटा ग़र मान है तो बेटी कौन सा अपमान है,
क्यूँ नहीं समाज देता इन्हें इज्ज़त समान है...


#SwetaBarnwal

Friday, 13 March 2020

ख़ास हूँ मैं...

कैसे कह दूँ अब जीने की चाह नहीं इस दिल में,
ना जाने कितने ही लोगों के जीने की वज़ह हूँ मैं...
कैसे रोक लूँ अपनी सासों को मैं,
ना जाने कितने ही दिलों की धड़कन हूँ मैं,
कैसे कह दूँ कि अब ज़िंदगी से हार बैठी हूँ मैं,
जबकि कितने ही लोगों की उम्मीद हूँ मैं,
ख़ुद के लिए एक मुट्ठी ख़ुशी भी ना ख़रीद पाई कभी,
फ़िर भी ना जाने कितनों के ख़ुशी की वज़ह हूँ मैं,
होंठों पर खोखली सी हंसी समेटे हुए हरदम,
ना जाने कितने ही चेहरों की मुस्कान हूँ मैं,
मर चुका है दिल से सारे अह्सास जिसके,
औरों के जीवन में महकती हूँ मैं अह्सास बनके,
कुछ भी तो नहीं है ख़ास मुझमे,
फ़िर भी ना जाने कितनों के लिए ख़ास हूँ मैं...


#SwetaBarnwal


Saturday, 7 March 2020

नारी हूँ मैं कोई श्राप नहीं...

तोड़ के हर दर-ओ-दिवार,
एक दिन मैं उड़ जाउंगी,
इस दुनिया से दूर कहीं
एक नया जहां बनाऊँगी,
लाख लगा लो पहरे मुझपर,
आसमाँ को छू कर मैं दिखलाउंगी,
तोड़ के सारे बंधन मैं
फुर्र से उड़ जाउंगी,
बांध दो ईन पैरों में चाहे
रस्मों रिवाज की जंजीरें,
बदल के तेरी दुनिया मैं
नया इतिहास रचाउंगी,
अपनी मेहनत और हिम्मत से,
अपनी पहचान बनाऊँगी,
जो नहीं हुआ है पहले कभी,
वो करके मैं दिखलाउंगी,
लड़की हूँ कोई बोझ नहीं,
ये सबको अब समझाउंगी,
खड़ी कर दो चाहे कितनी भी ऊंची
परंपराओं की दिवार तुम,
या बिछा दो कितने भी कांटे
मेरी राहों में तुम,
नौ महिने कोख में रख कर तुझको
जो दे सकती है जीने का अधिकार तुझे,
फ़िर सोचो ग़र आ जाए वो ज़िद पर अपने
क्या नहीं फ़िर कर सकती है वो,
नारी हूँ मैं कोई श्राप नहीं,
छीने कोई हक़ मेरा
ये किसी को अधिकार नहीं...

#SwetaBarnwal


बस एक दिन मे ना बांधों तुम नारी के सम्मान को,

गर दे सकते हो तो दे दो पंख उनके स्वाभिमान को...

महिला दिवस के एक दिन के लिए जो है वंदनीय,

भला क्यूँ रहे वो 364 दिन निंदनीय...

#SwetaBarnwal 

Saturday, 1 February 2020

आज़ादी..., अभिव्यक्ति की...

आज़ादी..., अभिव्यक्ति की...
बातों की... विचारों की...
कुछ कहने की आज़ादी
सब झेलने की आज़ादी
माना भारत देश के संविधान में
19(1) के तहत दी है सबको
आज़ादी..., अभिव्यक्ति की...
पर इसका मतलब क्या है
तुम देश विरोधी नारे दोगे,
भारत माँ के सीने पर तुम
रोज आतंकवाद का खेल रचोगे,
खुलवा आधी रात को संसद के दरवाजे
तुम आतंकवादियों के मसीहा बनोगे,
क्या यही है तुम्हारी
आज़ादी..., अभिव्यक्ति की...
बलात्कारियों की तुम वक़ालत करोगे
नाबालिग कह कर उसको
मशीन और पैसे दोगे
अरे सोचों एक बार ज़रा तुम
नाबालिक होकर जिसने
किया ऐसा कुकृत्य है
बालिग़ हो गया जो वो तो
कितना विध्वंश मचायेगा,
ना जाने कितनी निर्भया
अभी और लूटी जाएगी,
ना जाने कितने ही माँ बाप यहाँ
इन्साफ़ के इंतजार में मर जायेंगे,
अन्याय का यूं साथ देने वालों
क्या यही है तुम्हारी
आज़ादी..., अभिव्यक्ति की...
हर घर से अफजल पैदा करने वाले को
देश का हीरो बना दिया,
भारत के टुकड़े करने वालों को
भौंकने को ज़िंदा छोड़ दिया,
हर देश द्रोही के साथ यहां
खड़ा ये मानवाधिकार आयोग है,
न्यायपालिका यहाँ की मौन है,
न्याय वयवस्था बड़ी कमजोर है,
देश के कानून को रौंदने वालों
क्या यही है तुम्हारी
आज़ादी..., अभिव्यक्ति की...
लूटी जो अस्मत लड़की की
तुम रहे ख़ामोश सदा,
हैदराबाद के एक एनकाउन्टर मे
मुर्दे भी सारे बोल पड़े,
पहना कर कानून के आँखों में काली पट्टी
बहुत खेली तुमने आँख मिचोली,
अफजल, कन्हैया, ओवैसी
के आतंकवाद के खुले ऐलान
पे चुप्पी साधे लोग,
गोपाल की एक गोली पर
विधवा विलाप मचाने वाले,
क्या यही है तुम्हारी
आज़ादी..., अभिव्यक्ति की...
कहीं तिरंगे का अपमान हुआ,
कहीं गौ माता का वध हुआ,
कभी जन गण और वंदे मातरम का
खुल कर विरोध हुआ,
राष्ट्र गान के सम्मान में जिनको
खड़े होना भी गंवारा नहीं,
बात जहां भी हो देशप्रेम और हिन्दुत्व की
सैकड़ों फन मचलने लगते हैं
आता है क्रोध बहुत तब जब ऐसी हालत में
ज़हर उगलने वाले पत्रकर मौन हो जाते हैं
देशद्रोह भरा है मन में जिनके
और अपनी बातों से सबको ये लड़वाते है
क्या यही है तुम्हारी
आज़ादी..., अभिव्यक्ति की...
मैं कहती हूँ जब खुले गगन मे
तिरंगा खुल कर लहराएगा
जब घर घर में गौ माता पूजी जाएगी,
जब घर से निकली बेटी
साँझ ढले घर को सुरक्षित आएगी,
तब सही मायनों में होगी यारों
आज़ादी..., अभिव्यक्ति की...
जब देश की कोई गली
इतनी भी सम्वेदनशील ना हो
कि वंदे मातरम के नारे से
कोई चंदन गुप्ता मारा जाए,
भारत के टुकड़े करने वालों को
टुकड़ों में बांटा जाए,
तब सही मायनों में होगी यारों
आज़ादी..., अभिव्यक्ति की...
जब सरहद के वीर सिपाही
गली के गुंडे ना कहलाएं,
आए जो इस देश पर कोई मुसीबत
सब मिल कर यलगार लगाए,
जब जाति धर्म से ऊपर उठ कर,
देश की रक्षा सबका ईमान बन जाए,
तब सही मायनों में होगी यारों
आज़ादी..., अभिव्यक्ति की...
जब कश्मीरी पंडितों को
पुनर्वास करवाया जाएगा,
जब शाहीन बाग में बरस रही अल्लाह की मेहर
भूखों का निवाला बन जाएगी,
तब सही मायनों में होगी यारों
आज़ादी..., अभिव्यक्ति की...
जब हम अपनी सभ्यता और संस्कृति को
फ़िर से गले लगाएंगे,
जिन्हें भारत से प्यार नहीं,
उनको भारत में रहने का अधिकार नहीं,
भंग करे जो शांति यहां की
उन्हें जन्नत की सैर कराएंगे,
अन्याय का साथ जो दे यहां
उन्हें उनकी औकात दिखाएंगे,
देशद्रोहियों को सबक सिखाने के ख़ातिर
करें कानून को सख्त जरा जो,
तब सही मायनों में होगी यारों
आज़ादी..., अभिव्यक्ति की...


#SwetaBarnwal





Monday, 27 January 2020

भारत; एक नई पहचान...

लाशों की इस नगरी में
अरमान सजाने निकली हूँ...
भारत को फ़िर से एक नई
पहचान दिलाने निकली हूँ...

सदियों से जो सोये हुए हैं
उनको आज जगाने निकली हूँ,
भारत माँ की बेटी मैं
मिट्टी का कर्ज चुकाने निकली हूँ,

लाशों की इस नगरी में
अरमान सजाने निकली हूँ...

छोड़ो भी ये तीज त्योहार,
फा़नदो अपने घर की चार दीवार,
अब तोड़ भी दो अपनी ख़ामोशी को
छोड़ो अपनी मदहोशी को,
कब तक गद्दारों को हम सर का ताज बनाएंगे,
कब तक झूठे भाई चारे की यूँ रित हम निभाएंगे,
आख़िर कब तक वीरों की कुर्बानी यूँ ही जाया जाएगी,
अब तो जागो साथियों कि मैं तुम्हें जगाने निकली हूँ

लाशों की इस नगरी में
मैं अरमान सजाने निकली हूँ...

खून खौलता है अब मेरा जब लहू देखा वीर जवानों की,
ना जाने सूनी हो गई गोद कितने ही माओं की,
उजड़ गया सुहाग ना जाने कितने ही नव वधुओं का,
नाथ छिन गया ना जाने कितने ही बच्चों का,
देख ऐसी दुर्दशा देश की मैं ललकार लगाने निकली हूँ,

लाशों की इस नगरी में
मैं अरमान सजाने निकली हूँ...

कौन कहता है कि चरखे ने आज़ादी दिलाई है,
क्या पागल थे वो लोग जिन्होंने सीने पे गोली खाई है,
मांगने से अगर मिल जाती स्वतंत्रता,
तो यूँ माँ भारती का आँचल लहू से लाल नहीं होता,
जो भ्रांति फैली हुई है यहाँ सभी के मन में,
अपनी आवाज़ से मैं उसे मिटाने निकली हूँ,

लाशों की इस नगरी में
मैं अरमान सजाने निकली हूँ...

टुकड़ों में माँ भारती को आज उन्हीं के सपूत करने को तैयार है,
आतंकवाद की डगर पे देखो सब चलने को तैयार हैं,
अपनों के हाथों में ही खंजर है कोई नहीं यहाँ मददगार है,
लूटने को सब बैठे हैं यहां कोई नहीं पहरेदार है,
छोड़ घर की दहलीज़ आज मैं
अपनी कलम से यलगार लगाने निकली हूँ,

लाशों की इस नगरी में
मैं अरमान सजाने निकली हूँ...

सत्ता के लिए देश बांटने वालों की है ये ज़मीं नहीं,
मातृ भूमि पे जो मर मिटे उनकी ये फुलवारी है,
आतंकवाद को उखाड़ फेंकने की अब हमने ठानी है,
अपने मे छुपे हुए गद्दारों की ख़तम अब हर कहानी है,
मातृभूमि की रक्षा के ख़ातिर मैं अलख जगाने निकली हूँ,
ज़िंदा लाशों मे अब मैं अंगार भरने निकली हूँ...

लाशों की इस नगरी में
मैं अरमान सजाने निकली हूँ...

भारत को एक बार फिर से विश्व गुरु बनाने निकली हूँ,
भूल चुके जो बात सभी वो सबको याद दिलाने निकली हूँ,
इस मिट्टी का मोल सभी को मैं समझाने निकली हूँ,
धूमिल पड़ गई जो छवि इसकी मैं उसे संवारने निकली हूँ,
माँ भारती की बेटी मैं आसमाँ मे भगवा लहराने निकली हूँ...

लाशों की इस नगरी में
मैं अरमान सजाने निकली हूँ...

आजादी के इस पावन अवसर पर ये  अह्सास जगाने निकली हूँ, 
असंख्य बलिदानों के बाद मिली है जो उसको सम्मान दिलाने निकली हूँ, 
चरखे और लाठी से आजादी कब मिली है किसी को, 
सीने पर गोली खाई थी वीरों ने तब जाकर ये आज़ादी पाई है, 
खैरात मे नहीं मिलती है आजादी ये सबको याद दिलाने निकली हूँ... 

लाशों की इस नगरी में
मैं अरमान सजाने निकली हूँ...
भारत माँ को फ़िर से एक नई
पहचान दिलाने निकली हूँ...

#SwetaBarnwal

ऐ विधाता...!

 ऐ विधाता...! ना जाने तू कैसे खेल खिलाता है...  किसी पे अपना सारा प्यार लुटाते हो, और किसी को जीवन भर तरसाते हो,  कोई लाखों की किस्मत का माल...