Sunday, 3 May 2020

सोचा ना था...! कभी ऐसा दौर भी आएगा...

सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...

स्कूल दफ्तर सारे बंद होंगे,
और छुट्टियों का आलम होगा,
सारे होंगे घर में फ़िर भी,
मिलना किसी से सम्भव ना होगा,
कोई घर में कैद होगा,
कोई घर से कोसों दूर होगा,
कोई घर में रहने को मजबूर होगा
कोई घर जाने को तरसेगा,
कोई सड़कों पर ज़िंदगी गुज़ारेगा,
कोई आंखों में रातें काटेगा...

सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...

वक़्त होगा सबके पास,
पर मिलना होगा दुश्वार सभी का,
सडकें होंगी खाली मगर,
कहीं जाना भी यार ना होगा,
छोटी दूरी, मिलों का सफ़र
तय करना आसान ना होगा,
बच्चे होंगे घर में सारे,
फ़िर भी सूनी होंगी गलियां,
खाली होंगे खेल के मैदान सारे,
बच्चे भी अब चुपचाप रहेंगे,
दूर वालों को बुला ना पाएंगे,
और पास वालों से कभी मिल ना पाएंगे...

सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...

उपेक्षित हो गए थे जो बुजुर्ग कभी,
उन्हें भरा पूरा परिवार मिलेगा,
मिल बैठेंगे सारे घर वाले,
रामायण और महाभारत का श्रवण होगा,
संस्कारों की गंगा बहेगी,
बच्चे अपनी संस्कृति से जुड़ेंगे,
छूट गया था जो अपनापन
इस पश्चिमीकरण की अंधी दौड़ में,
उन दुर्भावनाओं का भी
फ़िर से कुछ समाधान मिलेगा...

सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...

चहचहायेंगे पंछी नभ मे,
उनको खुला आसमान मिलेगा,
मछली भी जल में तैरेगी ,
गंगा का जल फ़िर से अमृत होगा,
इंसान कैद होंगे चहारदीवारी मे,
और जीव जंतु स्वच्छंद विचरण करेंगे,
स्वच्छ होंगी हवाएं
प्रकृति भी उन्माद करेगी,
वातावरण में शांति दौड़ेगी,
खिलखिला उठेगी ये धरा,
साफ़ होगा आसमाँ
और सडकें होंगी खाली...

सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...

समय गुजर रहा है
पर हर कोई चुपचाप खड़ा हैं,
कोई स्तब्ध है
तो कहीं कोई मौन पड़ा है,
तारीखें बदल रही हैं,
पर लम्हों का कोई हिसाब नहीं,
जिस ताकत के बल पर उन्मत्त था इंसान कभी,
आज उनसे ही मात खा रहा है,
चला था देने चुनौती विधाता को,
आज उसी के सहारे ज़िंदगी बचा रहा है,
जिस विज्ञान पर घमंड था उसे,
आज वो भी किसी काम ना आ रहा है...

सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...

मॉल, सिनेमा, पार्क और होटल
सब पर होंगे ताले,
नहीं कहीं कोई चोरी होगी,
क्यूंकि घर में ही होंगे घर के रखवाले,
बंद हो जाएंगे सड़कों के हादसे,
क्यूंकि बंद होंगे सारे यातायात,
नहीं कोई बिमार होगा,
ना होगा हॉस्पिटल का मीटर चालू,
सादा जीवन होगा सबका,
खायेंगे सब चावल, दाल और आलू,
नहीं कोई चौपाटी होगी
ना कहीं कोई शादी और पार्टी,
ना रस्मों रिवाजों की भेंट चढ़ेगी
कहीं कोई बहु तो कहीं कोई बेटी...

सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...

अब ना तो सोमवार आने का दुःख
और ना इतवार के चले जाने का ग़म,
ना कोई काम पे जाने का झंझट,
और ना ही किसी छुट्टी का इंतजार,
ना बच्चों का homework का बोझ,
ना ज्यादा कमाने का साधन,
ना ही खर्चने का कोई ज़रिया,
ना ही बॉस की खिच खिच की झल्लाहट,
ज़िंदगी में पहली बार
सबको इतनी लंबी इतवार मिली है,
पहली बार working mother को
अपना छोटा सा संसार मिला है...

सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...

सालों बाद माँ बेटी ने मिलकर
छत पर लंबी दौड़ लगाई,
सालों बाद बेटी ने माँ का हाथ बटाया,
सालों बाद बेटा
बाप के गोद सर रख कर सोया,
सालों बाद पति पत्नी ने
एक दूजे को दिल का हाल सुनाया,
सालों बाद अमीरों ने
गरीबों के ज़ख्मों पर मलहम लगाया,
सालों बाद घर के सारे लोग
एकसाथ बैठ खाना खाए,
सालों बाद फ़िर से वो दौर आया,
जब लोगों को परिवार का महत्व समझ आया,
सालों बाद एक बार फिर से
हमने अपने संस्कारों को अपनाया...

सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...



#SwetaBarnwal

किसी रंग से कोई बैर नहीं,
पर भगवा हमको प्यारा है...
हिन्दुत्व रक्षा के ख़ातिर,
हमने सर पर कफन बांधा है...
#SwetaBarnwal

बुजुर्गों का सम्मान... 🙏

बुढ़े माँ बाप या घर में कोई बुजुर्ग,
करते हैं रखवाली घर की जैसे कोई दुर्ग,
ये हैं घर की वो दिवार,
जो अपने आशीर्वाद से रोकते हैं हर वार,
संस्कारों की खान हैं ये,
बच्चों के लिए तो जैसे वरदान हैं ये,
एक मधुर स्मृति होते हैं ये
हमारे सुदृढ़ वर्तमान की नींव हैं ये,
अंधेरी ज़िंदगी में
टिमटिमाते लौ की भांति होते हैं ये,
प्यार इनका कवच
और इनका आशीर्वाद हमारा ढाल बन जाए,
जब कभी भी ज़िंदगी में
हमारे अनचाहा कोई मुकाम आ जाए,
ख़ुद को कभी जलाया,
तब जाकर आज यहां हमें पहुंचाया,
हर मुश्किलें सहीं हमारी ख़ातिर,
हम पर अपना सर्वस्व लुटाया,
ये हैं तो हम हैं,
वर्ना हम क्या और हमारा अस्तित्व क्या,
मत कष्ट पहुंचाना इनको तुम,
मत बनना इनके आंसुओं की वज़ह कभी,
ये हैं घर की वो दीवार
जो निरस्त कर दें काल का भी प्रहार,
ग़र आए जीवन में कोई तूफ़ान,
अपने अनुभव से कराएं नैया पार,
बड़े बूढ़ों का जो सम्मान करे,
उनके जीवन में सुख का संचार रहे...
आज हम पाश्चात्य सभ्यता मे ऐसे रंगे,
भूल के अपनी संकृति वृद्धों का अपमान करें,
बच्चों को आया के हाथ सौंप,
बुढ़े माँ बाप को तिरस्कृत कर वृद्धाश्रम पहुंचाये,
कैसे आए बच्चों मे संस्कार
जब हम ही संस्कार हीन हो जाएं,
जो आज दिखाओगे तुम बच्चों को,
कल तुम भी वही पाने के हकदार बनोगे,
ये वक़्त का पहिया है
चलता ही जाएगा,
जो तू आज बोयेगा,
वो ही कल पाएगा,
बीज बो कर नफ़रत की,
भला सम्मान कैसे पाएगा...
अब भी वक्त है
सम्भल जाओ तुम,
ग़र जीना चाहते हो बुढ़ापे मे शान से,
तो जीने दो अपने बुजुर्गों को सम्मान से...
आओ मिल कर आज ये संकल्प करें,
कभी ना हो घर में अपमान बुजुर्गों का,
मिट्टी के ये बर्तन नहीं
जो जब जी चाहा फोड़ दिया,
ये कोई जानवर भी नहीं,
जो रस्ते पर मरने छोड़ दिया,
लहू देकर अपना जिन्होंने पाला हमको,
भला क्यूँ तिरस्कृत हो बुढ़ापे मे वो,
वृद्धाश्रम मे वो नन्ही किलकारी को तरसे,
और घर में बच्चे संस्कारों को तरसे,
पैसों की चकाचौंध मे इंसानों ने रिश्ते खोए,
हर मुसीबत आई जब भी बुढ़ापा आया,
क्यूँ बिसराते जा रहे हैं बच्चे,
अपने ऊपर किए अहसान बुजुर्गों का,
बड़ी किस्मत से मिलता है यारों,
प्यार और आशीर्वाद बुजुर्गों का...


#SwetaBarnwal

Friday, 1 May 2020

ओ कोरोना...!

ओ कोरोना...!
आख़िर तुझे मैं क्या नाम दूँ...
मौत कहूँ या जिंदगी का नाम दूँ,
अपनों से दूरी की वज़ह कहूँ
या ख़ुद को ख़ुद से मिलवाने का ज़रिया कहूँ,
दर्द कहूँ या कह दूँ दवा तुझे,
हवाएं दूषित थी,
ज़िंदगी अस्त व्यस्त थी,
जानवर और पंछी त्रस्त थे,
इंसान घमण्ड मे सारे मदमस्त थे,
गाड़ियों और फैक्ट्रियों का शोर था,
प्रदूषण चारो ओर था
अपराध घनघोर था,
सब के मन में चोर था
नदियों का पानी मैला था,
हवाओं में फैला ज़हर था,
रिश्तों में उसका दिखता असर था,
किसी के पास किसी के लिए ना वक़्त था,
हर कोई अपने मे ही बस व्यस्त था,
पैसों की दौड़ थी,
भागने की बस होड़ थी,
सब को ख़ुद पे गुमान था,
विज्ञान पर अभिमान था
जंगलों को काट रहा था,
नदियों की धारा मोड़ रहा था,
प्रकृति के साथ कर रहा खिलवाड़ था,
गगनचुंबी इमारतों से
आसमान को दे रहा चुनौती था,
इंसान को अपने सामर्थ्य पर
हो गया घमण्ड था,
तभी अचानक एक छोटा सा
Virus औचित्य मे आया,
जिसने ला कर रख दिया
सारी दुनिया को घुटनों पर,
दिखा दिया औकात इंसान को,
मौत का खौफ़ यूँ हर ओर छाया,
विज्ञान भी तब कुछ काम ना आया,
क़ैद करने चला था जो पूरे संसार को
कैद हो कर रह गया वो
अपने ही घर की चारदिवारी मे,
आज नदियां लहरा रही हैं,
पंछी चहचहा रहे हैं,
हवाओं में ताजगी है,
ज़िंदगी में सादगी है,
जीव जंतु मस्त है,
प्रकृति भी आज स्वस्थ है,
धरा आज ख़ुशहाल है,
सृष्टि भी आज निहाल है.
समझ नहीं आता
ओ कोरोना...!
आख़िर तुझे मैं क्या नाम दूँ...
तुझे ज़िंदगी कहूँ
या कोई मौत का पैगाम हो तुम,
कोई ख़ुशी हो
या संहार का संचार हो तुम,
सृष्टि का संतुलन हो
या महाकाल का काल हो तुम,
अपनों का विछोह हो
या अपनों का समावेश हो तुम,
कोई भ्रांति हो
या विश्व शांति का पैगाम हो तुम,
कोई रोग हो,
या इंसानी रोगों का उपचार हो तुम,
ओ कोरोना...!
आख़िर तुझे मैं क्या नाम दूँ...


#SwetaBarnwal


Sunday, 26 April 2020

हाँ मैं हिन्दू हूँ... 🚩

मैं हिन्दू हूँ,
भारत माँ के मस्तक का
मैं एक चंद्र बिंदु हूँ,
शोभा हूँ, श्रृंगार हूँ,
भारत का मैं गौरव हूँ,
अतीत हूँ, वर्तमान हूँ,
मैं ही भारत का भविष्य हूँ

हाँ मैं हिन्दू हूँ...

हर वक़्त अमन और चैन की बात मैं करता रहता हूँ,
हिन्दू मुस्लिम भाई भाई का राग अलापता रहता हूँ,
हजारों बार लुटने पर भी और लुटने की हिम्मत रखता हूँ,
Secular बन अपने ही भाई बहनों को मैं डसता हूँ,

हाँ मैं हिन्दू हूँ...

वो घर में मेरे आग लगाए
और मैं वसुधैव कुटुम्बकम की बात करता हूँ,
वो आतंकवाद का नंगा नाच करते हैं
और मैं सौहार्द की ढाल रखता हूँ,
कभी पेट्रोल बम तो कभी Corona बम लेकर आते हैं
और मैं भीगी बिल्ली सा कहीं कोने में छुप जाता हूँ,

हाँ मैं हिन्दू हूँ...

धमनियों मे बह रहा खून मेरा अब पानी हो गया है,
घुट घुट कर जीने का ही नाम जवानी हो गया है,
एक ललकार पर निकल पड़े सभी ये ख्याल अब बेमानी हो गया है,
बप्पा रावल की तलवार बस एक कहानी हो गया है

हाँ मैं हिन्दू हूँ...

धर्म रक्षा के ख़ातिर जो प्राण लुटाना जानते थे,
आज वो कश्मीरी मात्र शरणार्थी हो गए हैं,
हमारे धर्म का मजाक उड़ता रहा और मैं मौन रहा,
धर्म निरपेक्ष की दौड़ में बस मैं अकेला दौड़ पड़ा,

हाँ मैं हिन्दू हूँ...

“अहिंसा परमो धर्मः" इतना तो मुझको याद रहा
"धर्म हिंसा तथैव च:” ना जाने ये कैसे भूल गया,
वो अफजल, अख़लाक़ और कसाब का चारा हमे बनाते रहे,
देश धर्म की बलिवेदी पर ना जाने क्यूँ अब तक मैं मौन रहा,

हाँ मैं हिन्दू हूँ...

मर जाये ग़र कभी धर्म देश का,
कहते हैं वो देश भी ज़िन्दा नहीं रहता ज़मी पर,
हाँ कल तक थोड़ा मदहोश था मैं,
अपने ही ख्यालों में गुम बैठा हुआ सा,
पर मत सोचना कि मैं सोया हुआ हूँ,
बस तेरे क्रूर चालों से थोड़ा आहत पड़ा हूँ

हाँ मैं हिन्दू हूँ...

जाग उठा हूँ आज मैं, अब तुम्हें जगाने आया हूँ,
हमको काफिर कहने वालों को मैं आज सुलाने आया हूँ,
बुजदिल थे वो जो देश धर्म को छोड़ कश्मीर से भागे,
हस्ती मिट्टी मे मिल जाती उनकी ग़र सौ भी हथियार उठाते,

हाँ मैं हिन्दू हूँ...

अरे वो भी हिन्दू थे जिसने मातृभूमि पर अपने लाल लुटाये,
लड़ते लड़ते मिल गए मिट्टी में पर शीश नहीं झुकाए,
गोरी, गज़नी, अकबर, बाबर के अत्याचारों का प्रहार हूँ मैं,
पृथ्वीराज, प्रताप, शिवा का संबल इतिहास हूँ मैं,

हाँ मैं हिन्दू हूँ...

ना जाने कितने ही ज़ुल्म सहे है मैंने,
दिल पर लगे ज़ख्म कैसे मैं दिखलाऊँ,
क्या क्या सहा है मैंने ये कैसे बतलाऊँ,
ना जाने कितनों ने ही लुटा है मुझको बारी बारी,
फ़िर भी देखो अब तक मैंने ना हिम्मत हारी,

हाँ मैं हिन्दू हूँ...

#SwetaBarnwal

Saturday, 25 April 2020

हिन्दुत्व... 🚩

अब तो जागो हिन्दुओं, कि मैं तुम्हें जगाने आई हूँ...

अरे अब तो जागो ऐ वीर सपूतों,
तोड़ो तुम आलस की बेड़ी को,
आन पड़ी है विपदा फ़िर से,
त्यागो तुम अपनी चिर निद्रा को,
भरो ऐसा ओज तुम अपने आने वाली पीढ़ी मे,
भारत माँ के शान के ख़ातिर चढ़ जाए वो बलिवेदी पे,
दिखे नहीं अब द्रोही ध्वज, भगवा ही अपनी शान है,
आतंकी टोली का अब रहे नहीं नाम - ओ-निशान है

अब तो जागो हिन्दुओं, कि मैं तुम्हें जगाने आई हूँ...

जंग पडी जो तलवारों मे
उस पर अब धार चढ़ानी है,
आंख उठे जो हिन्दुत्व पे कोई,
उसको औकात दिखानी है,
कहाँ गई वो ओज प्रताप की,
जिसने अकबर को धूल चटाई थी,
कहाँ गई वो लक्ष्मी बाई,
जो चंडी बन दुश्मन पर लहराई थी,
कहाँ गई वो भगत, सुखदेव और राजगुरू की टोली है,
जिसने संसद में आग लगा कर दुश्मनों मे हड़कंप मचाई थी,
मचा हुआ है हाहाकार देश में,
और तूने है सर पर चादर तानी,

अब तो जागो हिन्दुओं, कि मैं तुम्हें जगाने आई हूँ...

करते रहो तुम बातेँ गंगा जमुना तहजीब की,
और सिखाओ अपने बच्चों को हिंदू मुस्लिम भाई भाई,
ये बम के गोले फेंकेगे, तुम हाथ जोड़े प्रणाम करो,
अपनी कायरता का तुम नतमस्तक हो सम्मान करो,

अब तो जागो हिन्दुओं, कि मैं तुम्हें जगाने आई हूँ...

आख़िर कब तक तुम बातेँ करोगे भाई चारे और प्रेम की,
कब तक ईद की मुबारक बात देने उसके जाओगे,
कब तक love zihad मे अपनी बहन बेटियों को नीलाम करोगे,
कब तक आतंकवाद का नंगा नाच तुम देखोगे,
आख़िर कब तक भारत के टुकड़े करने वालों को हम सर का ताज बनाएंगे,

अब तो जागो हिन्दुओं, कि मैं तुम्हें जगाने आई हूँ...

कब तक मुस्लिम तुष्टीकरण के ख़ातिर बलि तुम्हारी दी जाएगी,
कब तक 30% मुस्लिम वोट बैंक 70% हिन्दुओं को धूल चटाएंगे,
आख़िर कब तक हम नेताओं के हाथों की कठपुतली बन कर नाचेंगे,
भारत पाक के मैच में वो पाक के जीत का जश्न मनाता है,
हमारे टैक्स के पैसों से देखो वो अपनी आबादी बढ़ाता है,

अब तो जागो हिन्दुओं, कि मैं तुम्हें जगाने आई हूँ...

भूल गए क्या तुम भारत माँ के उन टुकड़ों को,
जब भी माँ का अंग कटा, एक नया इस्लामिक राष्ट्र बना,
लगता है भूल गए तुम 47 के उस बंटवारे को,
पूरी ट्रेनें भर कर आई थी हिन्दुओं की लाशों से,
अरे छोड़ो उन दिनों की बातों को, मैं आज की बात बताती हूँ,
खाते हैं ये भारत का और गुणगान पाक का गाते हैं,

अब तो जागो हिन्दुओं, कि मैं तुम्हें जगाने आई हूँ...

जिस थाली में खाते हैं ये उसी मे थूक कर फिर जाते हैं,
भारत माँ की छाती पर ये आतंकवाद फैलाते हैं,
जब भी मौका मिलता है ये विद्रोही हो जाते हैं,
भारत के टुकड़े करने का ये ख्वाब सजाये फिरते हैं,

अब तो जागो हिन्दुओं, कि मैं तुम्हें जगाने आई हूँ...

महादेव का आह्वान करो, वाणी मे अपने ओज भरो,
दुष्टों से पट जाए धरती, महाकाल सा काल बनो,
कोलाहल मच जाए जग में ऐसी तुम हुंकार भरो,
भारत के टुकड़े करने वालों का अब तुम स्वयं संहार करो,
गद्दारों के लहू से रक्त रंजीत हो जाए ये भूमि ऐसा तुम प्रहार करो

अब तो जागो हिन्दुओं, कि मैं तुम्हें जगाने आई हूँ...

#SwetaBarnwal

Saturday, 4 April 2020

COVID-19

जीवन देने वालों को भी
ये मौत बांटते फिरते हैं,
किस नस्ल की पैदाइश हैं ये
बुरे दौर में भी ये आतंकवाद फैलाए चलते हैं,

सारी दुनिया जिस virus के सामने
घुटने टेक कर बैठ गई,
हर विकसित देश भी जिस के आगे हुआ आज लाचार है,
लाशों का देखो कैसे चारों ओर लगा हुआ अंबार है,

भारत भी ईन सबसे भला
कहाँ रहा अछूता था,
स्थिति विकट ना हो जाए
सरकार ने तुरंत कदम कड़े उठाए
दिया आदेश lock-down का
आख़िर देश को बचाना था
नैया भँवर मे डोल रही थी
सकुशल पार लगाना था
स्थिति विकट थी, संसाधन सीमित
किया अनुमोदन देशवासियों से
करे अनुपालन कुछ बातों का
Social distancing का ध्यान रखें,
हाथों को हर पल sanitize करें,
ना निकलें घर से बाहर तब तक,
जब तक ना हो अति आवश्यक,
निकलो जब तुम घर से बाहर,
मुह पर मास्क और हाथों में दस्ताने हो
छोटी छोटी बातों पर जो ध्यान दिया जाता
मुमकिन है हर बाजी हम जीत ही जाते ,

कठिन ना था ये अमल करना,
आख़िर अपनी जिंदगी का था सवाल,
फ़िर क्यूँ आख़िर कुछ लोगों ने मचाया इस कदर बवाल,
जमात मे शामिल हुए, गुटबाजियां की,
चोरी छुपे मस्जिदों में पनाह ली
सरकार की हर रणनीति को दरकिनार किया,
Social gathering को बढ़ावा दे
इस virus को फैलने का मौका दिया,

और तो और जब आए ये सरकार की नज़र में,
हर ओर फ़िर भयानक कोहराम मचाया,
कहीं किसी पे थूका, तो कहीं किसी को पीटा,
Nurses से अश्लीलता की, डॉ की धुलाई की,
देश के प्रहरी को पीटा, मर्यादा की हर सीमा लांघी,

आख़िर मकसद क्या है इनका,
क्यूँ मौत का बेच रहे सामान हैं ये,
क्या ये zehad के अंगार नहीं,
क्या ये मानव बम का विस्तार नहीं,
क्या यही सिखाता है मजहब इनका,
क्या इनका कोई उपचार नहीं...

आख़िर कब तक यूँ ही हम सहते जाएंगे,
कब तक हम मुह की खायेंगे,
आख़िर कब तक हम चुप चाप रहेंगे,
कब तक ये मौत का नंगा खेल रचेंगे,
इनकी हिम्मत तब तक है
जब तक हम ख़ामोश खड़े हैं
जिस दिन हम हिम्मत कर आगे बढ़ जाएंगे
उस दिन Corona के साथ अंत इसका भी हो जाएगा...

जय श्री राम.... 🙏🚩

#SwetaBarnwal 

ऐ विधाता...!

 ऐ विधाता...! ना जाने तू कैसे खेल खिलाता है...  किसी पे अपना सारा प्यार लुटाते हो, और किसी को जीवन भर तरसाते हो,  कोई लाखों की किस्मत का माल...