सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...
स्कूल दफ्तर सारे बंद होंगे,
और छुट्टियों का आलम होगा,
सारे होंगे घर में फ़िर भी,
मिलना किसी से सम्भव ना होगा,
कोई घर में कैद होगा,
कोई घर से कोसों दूर होगा,
कोई घर में रहने को मजबूर होगा
कोई घर जाने को तरसेगा,
कोई सड़कों पर ज़िंदगी गुज़ारेगा,
कोई आंखों में रातें काटेगा...
सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...
वक़्त होगा सबके पास,
पर मिलना होगा दुश्वार सभी का,
सडकें होंगी खाली मगर,
कहीं जाना भी यार ना होगा,
छोटी दूरी, मिलों का सफ़र
तय करना आसान ना होगा,
बच्चे होंगे घर में सारे,
फ़िर भी सूनी होंगी गलियां,
खाली होंगे खेल के मैदान सारे,
बच्चे भी अब चुपचाप रहेंगे,
दूर वालों को बुला ना पाएंगे,
और पास वालों से कभी मिल ना पाएंगे...
सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...
उपेक्षित हो गए थे जो बुजुर्ग कभी,
उन्हें भरा पूरा परिवार मिलेगा,
मिल बैठेंगे सारे घर वाले,
रामायण और महाभारत का श्रवण होगा,
संस्कारों की गंगा बहेगी,
बच्चे अपनी संस्कृति से जुड़ेंगे,
छूट गया था जो अपनापन
इस पश्चिमीकरण की अंधी दौड़ में,
उन दुर्भावनाओं का भी
फ़िर से कुछ समाधान मिलेगा...
सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...
चहचहायेंगे पंछी नभ मे,
उनको खुला आसमान मिलेगा,
मछली भी जल में तैरेगी ,
गंगा का जल फ़िर से अमृत होगा,
इंसान कैद होंगे चहारदीवारी मे,
और जीव जंतु स्वच्छंद विचरण करेंगे,
स्वच्छ होंगी हवाएं
प्रकृति भी उन्माद करेगी,
वातावरण में शांति दौड़ेगी,
खिलखिला उठेगी ये धरा,
साफ़ होगा आसमाँ
और सडकें होंगी खाली...
सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...
समय गुजर रहा है
पर हर कोई चुपचाप खड़ा हैं,
कोई स्तब्ध है
तो कहीं कोई मौन पड़ा है,
तारीखें बदल रही हैं,
पर लम्हों का कोई हिसाब नहीं,
जिस ताकत के बल पर उन्मत्त था इंसान कभी,
आज उनसे ही मात खा रहा है,
चला था देने चुनौती विधाता को,
आज उसी के सहारे ज़िंदगी बचा रहा है,
जिस विज्ञान पर घमंड था उसे,
आज वो भी किसी काम ना आ रहा है...
सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...
मॉल, सिनेमा, पार्क और होटल
सब पर होंगे ताले,
नहीं कहीं कोई चोरी होगी,
क्यूंकि घर में ही होंगे घर के रखवाले,
बंद हो जाएंगे सड़कों के हादसे,
क्यूंकि बंद होंगे सारे यातायात,
नहीं कोई बिमार होगा,
ना होगा हॉस्पिटल का मीटर चालू,
सादा जीवन होगा सबका,
खायेंगे सब चावल, दाल और आलू,
नहीं कोई चौपाटी होगी
ना कहीं कोई शादी और पार्टी,
ना रस्मों रिवाजों की भेंट चढ़ेगी
कहीं कोई बहु तो कहीं कोई बेटी...
सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...
अब ना तो सोमवार आने का दुःख
और ना इतवार के चले जाने का ग़म,
ना कोई काम पे जाने का झंझट,
और ना ही किसी छुट्टी का इंतजार,
ना बच्चों का homework का बोझ,
ना ज्यादा कमाने का साधन,
ना ही खर्चने का कोई ज़रिया,
ना ही बॉस की खिच खिच की झल्लाहट,
ज़िंदगी में पहली बार
सबको इतनी लंबी इतवार मिली है,
पहली बार working mother को
अपना छोटा सा संसार मिला है...
सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...
सालों बाद माँ बेटी ने मिलकर
छत पर लंबी दौड़ लगाई,
सालों बाद बेटी ने माँ का हाथ बटाया,
सालों बाद बेटा
बाप के गोद सर रख कर सोया,
सालों बाद पति पत्नी ने
एक दूजे को दिल का हाल सुनाया,
सालों बाद अमीरों ने
गरीबों के ज़ख्मों पर मलहम लगाया,
सालों बाद घर के सारे लोग
एकसाथ बैठ खाना खाए,
सालों बाद फ़िर से वो दौर आया,
जब लोगों को परिवार का महत्व समझ आया,
सालों बाद एक बार फिर से
हमने अपने संस्कारों को अपनाया...
सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...
#SwetaBarnwal
कभी ऐसा दौर भी आएगा...
स्कूल दफ्तर सारे बंद होंगे,
और छुट्टियों का आलम होगा,
सारे होंगे घर में फ़िर भी,
मिलना किसी से सम्भव ना होगा,
कोई घर में कैद होगा,
कोई घर से कोसों दूर होगा,
कोई घर में रहने को मजबूर होगा
कोई घर जाने को तरसेगा,
कोई सड़कों पर ज़िंदगी गुज़ारेगा,
कोई आंखों में रातें काटेगा...
सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...
वक़्त होगा सबके पास,
पर मिलना होगा दुश्वार सभी का,
सडकें होंगी खाली मगर,
कहीं जाना भी यार ना होगा,
छोटी दूरी, मिलों का सफ़र
तय करना आसान ना होगा,
बच्चे होंगे घर में सारे,
फ़िर भी सूनी होंगी गलियां,
खाली होंगे खेल के मैदान सारे,
बच्चे भी अब चुपचाप रहेंगे,
दूर वालों को बुला ना पाएंगे,
और पास वालों से कभी मिल ना पाएंगे...
सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...
उपेक्षित हो गए थे जो बुजुर्ग कभी,
उन्हें भरा पूरा परिवार मिलेगा,
मिल बैठेंगे सारे घर वाले,
रामायण और महाभारत का श्रवण होगा,
संस्कारों की गंगा बहेगी,
बच्चे अपनी संस्कृति से जुड़ेंगे,
छूट गया था जो अपनापन
इस पश्चिमीकरण की अंधी दौड़ में,
उन दुर्भावनाओं का भी
फ़िर से कुछ समाधान मिलेगा...
सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...
चहचहायेंगे पंछी नभ मे,
उनको खुला आसमान मिलेगा,
मछली भी जल में तैरेगी ,
गंगा का जल फ़िर से अमृत होगा,
इंसान कैद होंगे चहारदीवारी मे,
और जीव जंतु स्वच्छंद विचरण करेंगे,
स्वच्छ होंगी हवाएं
प्रकृति भी उन्माद करेगी,
वातावरण में शांति दौड़ेगी,
खिलखिला उठेगी ये धरा,
साफ़ होगा आसमाँ
और सडकें होंगी खाली...
सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...
समय गुजर रहा है
पर हर कोई चुपचाप खड़ा हैं,
कोई स्तब्ध है
तो कहीं कोई मौन पड़ा है,
तारीखें बदल रही हैं,
पर लम्हों का कोई हिसाब नहीं,
जिस ताकत के बल पर उन्मत्त था इंसान कभी,
आज उनसे ही मात खा रहा है,
चला था देने चुनौती विधाता को,
आज उसी के सहारे ज़िंदगी बचा रहा है,
जिस विज्ञान पर घमंड था उसे,
आज वो भी किसी काम ना आ रहा है...
सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...
मॉल, सिनेमा, पार्क और होटल
सब पर होंगे ताले,
नहीं कहीं कोई चोरी होगी,
क्यूंकि घर में ही होंगे घर के रखवाले,
बंद हो जाएंगे सड़कों के हादसे,
क्यूंकि बंद होंगे सारे यातायात,
नहीं कोई बिमार होगा,
ना होगा हॉस्पिटल का मीटर चालू,
सादा जीवन होगा सबका,
खायेंगे सब चावल, दाल और आलू,
नहीं कोई चौपाटी होगी
ना कहीं कोई शादी और पार्टी,
ना रस्मों रिवाजों की भेंट चढ़ेगी
कहीं कोई बहु तो कहीं कोई बेटी...
सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...
अब ना तो सोमवार आने का दुःख
और ना इतवार के चले जाने का ग़म,
ना कोई काम पे जाने का झंझट,
और ना ही किसी छुट्टी का इंतजार,
ना बच्चों का homework का बोझ,
ना ज्यादा कमाने का साधन,
ना ही खर्चने का कोई ज़रिया,
ना ही बॉस की खिच खिच की झल्लाहट,
ज़िंदगी में पहली बार
सबको इतनी लंबी इतवार मिली है,
पहली बार working mother को
अपना छोटा सा संसार मिला है...
सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...
सालों बाद माँ बेटी ने मिलकर
छत पर लंबी दौड़ लगाई,
सालों बाद बेटी ने माँ का हाथ बटाया,
सालों बाद बेटा
बाप के गोद सर रख कर सोया,
सालों बाद पति पत्नी ने
एक दूजे को दिल का हाल सुनाया,
सालों बाद अमीरों ने
गरीबों के ज़ख्मों पर मलहम लगाया,
सालों बाद घर के सारे लोग
एकसाथ बैठ खाना खाए,
सालों बाद फ़िर से वो दौर आया,
जब लोगों को परिवार का महत्व समझ आया,
सालों बाद एक बार फिर से
हमने अपने संस्कारों को अपनाया...
सोचा ना था...!
कभी ऐसा दौर भी आएगा...
#SwetaBarnwal