माँ... क्या अब मैं बड़ी हो गई हूँ
एक शाम यूँ ही बैठे थे हम अपने घर के छत पर
ना जाने कौन सी बेबसी हावी थी हम पर
समाज में पनप रहे शैतानों से अनजान ना थे हम
हर रोज लूटती बेटियों से लहूलुहान था ये मन
तभी अचानक मेरी नन्ही सी गुड़िया दौड़ी आई
थोड़ी सी सहमी हुई और थोड़ी सकुचाई
बड़ी मासूमियत से कहा माँ एक बात बताओगी
या फिर तुम भी सबकी तरह डांट लगाओगी
मैंने बड़े प्यार से उसे गले लगाया और कहा
किसकी इतनी मज़ाल जो मेरी गुड़िया को डांटे
जो भी है तेरे दिल में बेखौफ कह दे
माँ हूँ मैं तेरी जो तेरा हर दर्द बांटे
लंबी सी सांस लेते हुए उसने कहा
माँ... क्या अब मैं बड़ी हो गई हूँ
तुम सबके लिए मुसीबत की छड़ी हो गई हूँ
बात सुनकर उसकी मैं धक से रह गई
जैसे किसी गर्म तवे पर मैं पांव रख गई
वो अपनी ही लौ मे बहती चली गई
जो कुछ भी सुना था उसने वो कहती चली गई
कल बाबा ने डांटा मुझे
कहा किसी से अब कुछ ना लेना तुम
जो कोई लाड़ लड़ाए तो मुह फेर जाना तुम
रोज आइसक्रीम देने वाले काका भी अब गैर हो गए
क्यूंकि बेटी अब तू बड़ी हो गई है
भाई ने भी बहुत डांट लगाई मुझको
कहा अब बड़ी हो गई हो थोड़ा सलीके से रहा कर
फेंक छोटे कपड़े तन पे दुपट्टा रखा कर
क्यूंकि बहना अब तू बड़ी हो गई है
गई जो स्कूल तो टीचर ने भी चपत लगाई
बहुत हो गई चुहलबाजी अब थोड़ा ढंग से रहा कर
छोड़ शैतानियां बस पढ़ाई में अपने मन लगाया कर
बच्ची नहीं कोई अब तू बड़ी हो गई है
रही सही कसर माँ दादी ने पूरी कर दी
कहा छोड़ स्कूल अब घर में रहा कर
घर के कामों में माँ का अपने हाथ बटाया कर
यूँ लड़कों के साथ दोस्ती तेरी अच्छी नहीं
ओ गुड़िया की तु अब कोई बच्ची नहीं
अब तू ही बता ऐ माँ...!
कल तक की सबकी लाडली सबकी छुटकी
आज यूँ कैसे बड़ी हो गई
सबके नज़रों में मैं जैसे गुनाहों की लड़ी हो गई
क्यूँ पल में सबकी नज़रें यूँ फिर गई
ग़लत ना हो कर भी मैं सबकी नज़रों से गिर गई
मेरी सहेली बता रही थी कोई शैतान आता है
कभी गैरों के रूप में तो कभी अपनों के बीच से
नोच कर वो बोटियां हमारी ले जाता है
ऐसी दरिन्दगी को दुनिया बलात्कार का नाम देता है
ऐ माँ..! अब तुम्ही बताओ ये बलात्कार क्या होता है
क्या इसमे हमारी ग़लती होती है
या कर जाते हैं अनजाने में हम कोई अपराध
अगर नहीं तो फ़िर
किसी और की करनी की सज़ा हमे क्यूँ
नज़रें किसी और की खराब और पर्दे हम पर क्यूँ
भौंके कोई और बेड़ियाँ हमारे पांव में क्यूँ
दरिन्दगी दिखाए कोई और आज़ादी हमारी छीने क्यूँ
क्या किसी से चाकलेट लेना गुनाह हो गया
या फिर हमारा बेटी होना एक कलंक हो गया
वो कहती गई आँसू उसके गाल पर लुढ़कते गए
मैं स्तब्ध सी मुकदर्शक बन सुनती रही
हाँ बस सुनती ही रही उसकी हर बात
कोई जवाब नहीं था मेरे पास शायद
क्या आपके पास है... 😢
#SwetaBarnwal
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