Sunday, 9 June 2019

माँ की सिख...अपनी बेटी के लिए...

मैं अपने माँ होने का पूरा फर्ज़ निभाउंगी
अपनी प्यारी बेटी को मैं फौलाद बनाऊँगी
पड़ी जरूरत अगर कभी तो आंधी से लड़ जाएगी
लक्ष्मी बाई बन कर वो भारत की लाज़ बचाएगी
नहीं बांधुंगी कभी कोई बेड़ी उसके पांव में
एक अलग ही जोश होगा उसके हर ताव मे
करे ना जो सम्मान उसका उसको आँख दिखाएगी
अपनी फूल सी बच्ची को मैं अन्याय से लड़ना सिखाउंगी
कोई जो उसपर हाथ उठाए उसको मरोड़ना सिखाउंगी
अपने और पराये मे उसको फ़र्क करना सिखाउंगी
दहेज के लिए आग में जलते उसे नहीं देख पाऊँगी
पति बस पति है उसे परमेश्वर नहीं बताऊँगी
जीवन के हर मोड़ पर उसका साथ निभाउंगी
किया जो कन्यादान तो उसे भूल नहीं मैं जाऊँगी
करे जो अत्याचार जीवन साथी तो विरोध वो जताएगी
सही को सही और गलत को ग़लत कहना सिखाउंगी
पड़ी जरूरत कभी जो उसे हथियार उठाना सिखाउंगी
सहनशीलता के नाम पर उसे अत्याचार सहना ना सिखाउंगी
नारी है तु ये कहकर उसके अरमानों को ना रौंदुंगी
हर ख्वाब को उसके परवाज़ मैं दूंगी
जिस घर में उसे मान ना मिले ऐसे घर उसे ना ब्याहुंगी
औरत के स्वाभिमान के लिए लड़ना उसे सिखाउंगी
नारी है तु कमजोर नहीं ये बात उसे बतलाऊँगी
उठी नज़र जो नारी की स्मिता पे उसे कुचलना सिखाउंगी
जानती हूँ मैं हो सकता है कुछ ऐसा भी
दुनिया वालों की नज़रों में मैं एक बुरी माँ कहलाउंगी
फ़िर भी हर दुःख दर्द मे मैं उसका साथ निभाउंगी...

#SwetaBarnwal 

No comments:

ऐ विधाता...!

 ऐ विधाता...! ना जाने तू कैसे खेल खिलाता है...  किसी पे अपना सारा प्यार लुटाते हो, और किसी को जीवन भर तरसाते हो,  कोई लाखों की किस्मत का माल...