Sunday, 31 December 2017

भारत माँ के लाल बहुतेरे,
अब सबको जागना होगा,
क्यूँ देश की रक्षा का ज़िम्मा,
बस उन फ़ौज़ी पे होगा...

#SwetaBarnwal
थोड़ी सी मस्ती थोड़ा सा स्वाभिमान बचा पाई हूँ,
ये क्या कम है मैं अपनी हस्ती, अपनी पहचान बचा पाई हूँ,
कुछ उम्मीदें, कुछ सपने, कुछ मस्ती और कुछ महकती यादें ,
जीने के लिए बस मैं इतना ही सामान बचा पाई हूँ. 

#SwetaBarnwal

Thursday, 28 December 2017

इंतज़ार...

अब तो किसी अपने से भी, 
प्यार नहीं होता, 
किसी मुसाफिर का कोई, 
ऐतबार नहीं होता... 

होते हैं बस रिश्तों में 
समझौते यहां,
किसी को किसी से भी 
प्यार नहीं होता... 

दिल मे प्यार की हसरत लिए
ये उम्र गुज़र जाती है, 
कि किस्मत पे किसी का अपने
इख्तियार नहीं होता... 

जिस पल से है हमें प्यार बहुत
वो अक्सर हमारे ख्यालों मे होता, 
हक़ीक़त मे कभी भी उनका 
यूँ दीदार नहीं होता... 

बहुत बड़ी भीड़ है लोगों की
फिर भी हम अकेले हैं, 
अपने तो कई हैं मगर
अपना समझने वाला कोई नहीं होता... 

ढल जाती है ये ज़िन्दगी
यूँ ही गम की राहों मे, 
कि #श्वेता के होंठों को अब 
किसी हंसी का इंतज़ार नहीं होता...

#SwetaBarnwal

ऐसे ही नहीं मैं कविता बनाती हूँ...

अपने अहसासों को संजोती हूँ,
उसे शब्दों में पिरोती हूँ,
फिर काग़ज पे उतारती हूँ,
ऐसे ही नहीं मैं कविता बनाती हूँ...

कुछ दिल के अरमां संजोती हूँ,
कुछ खुशियों के पल ढूंढ लाती हूँ,
कुछ दर्द से नगमें चुराती हूँ,
ऐसे ही नहीं मैं कविता बनाती हूँ...

कुछ अहसास तेरे हैं तो कुछ मेरे, 
सज़ा लेती हूँ जज़्बातों को अल्फाज़ों में,
पिरो देती हूँ मैं हर सुख और दुख को,
ऐसे ही नहीं मैं कविता बनाती हूँ...

लफ़्ज़ों से सतरंगी सपने बुन लाती हूँ,
आसमान की सबको सैर कराती हूँ,
टूटे हुए दिल में अरमान जगा जाती हूँ, 
ऐसे ही नहीं मैं कविता बनाती हूँ...

सबकी सुनती हूँ कुछ अपनी सुनाती हूँ, 
दर्द में सबको अपनी सी लगती हूँ, 
रोते हुए को मैं हंसना सिखाती हुं, 
ऐसे ही नहीं मैं कविता बनाती हूँ... 


#SwetaBarnwal
किसी ने कहा है कि ;

*चार चार बेटियां विदा हो गई जिस घर में खेल कूद कर।*
*बहु ने आते ही नाप कर बता दिया की घर बहुत छोटा है।*....

तो हमने भी कह दिया कि;

चार-चार बेटियों की हज़ारों गलतियाँ माफ हो जाती है जिस घर में,
एक बहु की छोटी सी गलती भी स्वीकार नहीं होती है उस घर में...

#SwetaBarnwal 

Wednesday, 27 December 2017

कविता

ये कविता है जो लिखी नहीं जाती है, 
बस दिल से उतर कर शब्दों मे बदल जाती है,
ये अहसासों से पनपती है 
और अल्फाज़ों के खज़ानों से उभरती है,
इसका कोई रंग-रूप नहीं होता है, 
ना कोई मुकम्मल स्वरूप होता है, 
ये गमों में उभरती है, 
तो खुशियों में निखरती है,
कविता ना तेरी होती है और ना मेरी,
ना ही ये स्वार्थी होती है,
ये गैरों के दर्द में बरसती है,
तो दूसरों की आशिकी में भी चमकती है,
झांकती है सबके दिलों में ये,
थोड़ी सी चंचल तो थोड़ी नादान है ये,
जिसकी कलम हो ये उसी की नहीं होती है, 
ये वो जादु है जो हर दिल से गुज़रती है, 
छु जाती है ये कइयों के दिल को, 
कह जाती है ये कइयों के अनकहे जज़्बातों को,
ये हर कोई लिख ले मुमकिन नहीं, 
हर कोई इसे समझ पाए आसान नहीं, 
ये वो हुनर है जो सिखाई नहीं जा सकती है, 
ये कोई हुक़ुमत नहीं जिसपे किसी का हक़ हो,
ये अहसासों का मेल है, शब्दों का खेल है, 
जो दिल से निकलती है और कागज पे बिखर जाती है...
ये कविता है जो लिखी नहीं जाती है, 
बस दिल से उतर कर शब्दों मे बदल जाती है...

#SwetaBarnwal

स्त्री और पुरुष में एक स्वस्थ मैत्री...

आख़िर क्यूँ 
मुमकिन नहीं है 
स्त्री और पुरुष में 
एक स्वस्थ मैत्री... 

क्यूँ इन संबंधों में 
अक्सर आ जाता है 
एक बेबाकपन, 
और एक निर्लज़ता... 

जन्म ले लेती हैं,
कुछ अतृप्त इक्षाएँ, 
और दमित वासनाएं, 
मन के किसी कोने में... 

क्यूँ नहीं उठ पाता है समाज, 
अपनी ओछी सोंच से,
क्यूँ धस जाती है स्त्री, 
किचड़ में कमल सी... 

सामाजिक रीति-रिवाज़, 
और ये दुनियादारी, 
नहीं पनपने देती, 
ये मैत्री का अंकुर...

सारी सभ्यता और संस्कृति, 
करने लगते हैं तांडव, 
उठने लगते हैं कई सवाल, 
स्त्री की स्मिता पे... 

बस यहीं आकर थम जाती है, 
सारी सोंच की उड़ान, 
रुक जाते हैं उसके पैर, 
चहारदीवारी के अंदर... 

चलो तुम कहते हो तो 
मान ही लेती हूँ मैं 
कि नहीं हो सकती है
स्त्री और पुरुष में एक स्वस्थ मैत्री...

पर आज एक बात
मान लो तुम मेरी भी,
थोड़ी बदल लो गर तुम अपनी सोंच,
तो खुल कर मुस्कुरा उठेंगे हम भी...

फिर शायद होगा मुमकिन,
स्त्री और पुरुष में एक स्वस्थ मैत्री...

#SwetaBarnwal

ऐ विधाता...!

 ऐ विधाता...! ना जाने तू कैसे खेल खिलाता है...  किसी पे अपना सारा प्यार लुटाते हो, और किसी को जीवन भर तरसाते हो,  कोई लाखों की किस्मत का माल...