आख़िर क्यूँ
मुमकिन नहीं है
स्त्री और पुरुष में
एक स्वस्थ मैत्री...
क्यूँ इन संबंधों में
अक्सर आ जाता है
एक बेबाकपन,
और एक निर्लज़ता...
जन्म ले लेती हैं,
कुछ अतृप्त इक्षाएँ,
और दमित वासनाएं,
मन के किसी कोने में...
क्यूँ नहीं उठ पाता है समाज,
अपनी ओछी सोंच से,
क्यूँ धस जाती है स्त्री,
किचड़ में कमल सी...
सामाजिक रीति-रिवाज़,
और ये दुनियादारी,
नहीं पनपने देती,
ये मैत्री का अंकुर...
सारी सभ्यता और संस्कृति,
करने लगते हैं तांडव,
उठने लगते हैं कई सवाल,
स्त्री की स्मिता पे...
बस यहीं आकर थम जाती है,
सारी सोंच की उड़ान,
रुक जाते हैं उसके पैर,
चहारदीवारी के अंदर...
चलो तुम कहते हो तो
मान ही लेती हूँ मैं
कि नहीं हो सकती है
मुमकिन नहीं है
स्त्री और पुरुष में
एक स्वस्थ मैत्री...
क्यूँ इन संबंधों में
अक्सर आ जाता है
एक बेबाकपन,
और एक निर्लज़ता...
जन्म ले लेती हैं,
कुछ अतृप्त इक्षाएँ,
और दमित वासनाएं,
मन के किसी कोने में...
क्यूँ नहीं उठ पाता है समाज,
अपनी ओछी सोंच से,
क्यूँ धस जाती है स्त्री,
किचड़ में कमल सी...
सामाजिक रीति-रिवाज़,
और ये दुनियादारी,
नहीं पनपने देती,
ये मैत्री का अंकुर...
सारी सभ्यता और संस्कृति,
करने लगते हैं तांडव,
उठने लगते हैं कई सवाल,
स्त्री की स्मिता पे...
बस यहीं आकर थम जाती है,
सारी सोंच की उड़ान,
रुक जाते हैं उसके पैर,
चहारदीवारी के अंदर...
चलो तुम कहते हो तो
मान ही लेती हूँ मैं
कि नहीं हो सकती है
स्त्री और पुरुष में एक स्वस्थ मैत्री...
पर आज एक बात
मान लो तुम मेरी भी,
थोड़ी बदल लो गर तुम अपनी सोंच,
तो खुल कर मुस्कुरा उठेंगे हम भी...
फिर शायद होगा मुमकिन,
स्त्री और पुरुष में एक स्वस्थ मैत्री...
#SwetaBarnwal
4 comments:
Wow nice line
बहुत खूब
Nice
जिन्दगी का सच है ये
समाज कितना भी आधुनिक हो गया हो
पर आज भी ये स्त्री और पुरुष की
दोस्ती को शक़ की निगाह से ही देखता है...
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