Wednesday, 27 December 2017

स्त्री और पुरुष में एक स्वस्थ मैत्री...

आख़िर क्यूँ 
मुमकिन नहीं है 
स्त्री और पुरुष में 
एक स्वस्थ मैत्री... 

क्यूँ इन संबंधों में 
अक्सर आ जाता है 
एक बेबाकपन, 
और एक निर्लज़ता... 

जन्म ले लेती हैं,
कुछ अतृप्त इक्षाएँ, 
और दमित वासनाएं, 
मन के किसी कोने में... 

क्यूँ नहीं उठ पाता है समाज, 
अपनी ओछी सोंच से,
क्यूँ धस जाती है स्त्री, 
किचड़ में कमल सी... 

सामाजिक रीति-रिवाज़, 
और ये दुनियादारी, 
नहीं पनपने देती, 
ये मैत्री का अंकुर...

सारी सभ्यता और संस्कृति, 
करने लगते हैं तांडव, 
उठने लगते हैं कई सवाल, 
स्त्री की स्मिता पे... 

बस यहीं आकर थम जाती है, 
सारी सोंच की उड़ान, 
रुक जाते हैं उसके पैर, 
चहारदीवारी के अंदर... 

चलो तुम कहते हो तो 
मान ही लेती हूँ मैं 
कि नहीं हो सकती है
स्त्री और पुरुष में एक स्वस्थ मैत्री...

पर आज एक बात
मान लो तुम मेरी भी,
थोड़ी बदल लो गर तुम अपनी सोंच,
तो खुल कर मुस्कुरा उठेंगे हम भी...

फिर शायद होगा मुमकिन,
स्त्री और पुरुष में एक स्वस्थ मैत्री...

#SwetaBarnwal

4 comments:

Unknown said...

Wow nice line

Unknown said...

बहुत खूब

pallavipayal2002 said...

Nice
जिन्दगी का सच है ये

Sweta kumari Barnwal said...

समाज कितना भी आधुनिक हो गया हो
पर आज भी ये स्त्री और पुरुष की
दोस्ती को शक़ की निगाह से ही देखता है...

ऐ विधाता...!

 ऐ विधाता...! ना जाने तू कैसे खेल खिलाता है...  किसी पे अपना सारा प्यार लुटाते हो, और किसी को जीवन भर तरसाते हो,  कोई लाखों की किस्मत का माल...