Friday, 1 December 2017

पता ही ना चला...

कल तक माँ की साड़ी से खेलने वाली, बाबा का हाथ थामे चलने वाली
कब दुनिया की नज़र मे चुभने लगी, पता ही ना चला... ।

मायके से ससुराल तक का सफर तय कर लिया,
कब बेटी से बहु बन गई, पता ही ना चला... ।

अक्सर छोटी-छोटी बातों के लिए ज़िद पे अड़ने वाली,
कब इतनी समझदार हो गइ, पता ही ना चला... ।

एक छोटी सी ख्वाहिश पूरी ना होने पे घर को सर पे उठाने वाली,
कब अपनी ख्वाहिशों को मारना सीख गई, पता ही ना चला... ।

छोटी सी चोट पे आँखों मे मोटे-मोटे आँसू लाने वाली,
कब दूसरे के आँसू पोछना सीख गई, पता ही ना चला... ।

अपने माँ-बाबा के आँगन में दिन-रात चहकने वाली चिड़िया, 
कब एक मुस्कान को तरस गई, पता ही ना चला... ।

हर बात मे ख़ुद को सही साबित करने वाली वो ज़िद्दी,
कब बात-बात मे गलत साबित होने लगी, पता ही ना चला... ।

अपने हक़ के लिए लड़ने वाली और सच का साथ देने वाली,
कब उसका स्वाभिमान तार-तार हो गया, पता ही ना चला... ।

कल तक मस्तमौला, खुशमिजाज़ और स्वक्षंद रहने वाली लड़की,
कब आजा़दी की एक सांस को तरस गई, पता ही ना चला... ।

"श्वेता" कहती है कि, गुड्डे-गुडियों से खेलने वाली चंचल शोख हसीना,
कब खुद गुड्डे-गुडियों की मांँ बन गई, पता ही ना चला... ।

#SwetaBarnwal 

1 comment:

Unknown said...

Very nice. Keep it up.

ऐ विधाता...!

 ऐ विधाता...! ना जाने तू कैसे खेल खिलाता है...  किसी पे अपना सारा प्यार लुटाते हो, और किसी को जीवन भर तरसाते हो,  कोई लाखों की किस्मत का माल...