मेरे अश्कों को दरिया समझ वो कश्ती चलाते रहे,
मंज़िल मिले उन्हें यही सोच हम आँसू बहाते रहे...
#SwetaBarnwal
मंज़िल मिले उन्हें यही सोच हम आँसू बहाते रहे...
#SwetaBarnwal
ऐ विधाता...! ना जाने तू कैसे खेल खिलाता है... किसी पे अपना सारा प्यार लुटाते हो, और किसी को जीवन भर तरसाते हो, कोई लाखों की किस्मत का माल...
No comments:
Post a Comment