Sunday, 10 December 2017

मेरे अश्कों को दरिया समझ वो कश्ती चलाते रहे, 
मंज़िल मिले उन्हें यही सोच हम आँसू बहाते रहे...

#SwetaBarnwal 

No comments:

ऐ विधाता...!

 ऐ विधाता...! ना जाने तू कैसे खेल खिलाता है...  किसी पे अपना सारा प्यार लुटाते हो, और किसी को जीवन भर तरसाते हो,  कोई लाखों की किस्मत का माल...