Wednesday, 22 November 2017

ये बेटियाँ..,

घर आंगन की शोभा होती हैं ये बेटियाँ,
माँ के कलेजे का टुकड़ा और पिता का अभिमान होती हैं ये बेटियाँ,

जीवन बगिया को अपने  प्यार से महकाती हैं ये बेटियाँ,
हर सुख-दुख में खिलखिलाना जानती हैं ये बेटियाँ,

कभी माँ के कामों मे हाथ बंटाती हैं ये बेटियाँ,
तो कभी पिता के दर्द पे मरहम लगाती हैं ये बेटियाँ,

भाई के नाज़-नखरे उठाने वाली होती है ये बेटियाँ,
उनके दिल के सबसे करीब उनकी हमराज़ होती है ये बेटियाँ,

मान-मर्यादा और रस्मों-रिवाज़ों का बोझ ढोती है ये बेटियाँ,
संस्कारों के नाम पे हर वक़्त बलि होती हैं ये बेटियाँ,

करती है निवेदन #श्वेता सारे समाज से,
मत कुचलो तुम इस नाजु़क सी  कली को,
दो जीने का तुम अधिकार इसे भी,
दो ममता, प्यार, विश्वास और साथ इसे भी,
अरे सृष्टि मे सृजन का संचार करती हैं ये बेटियाँ,
यारों बड़ी निश्छल और बड़ी पावन होती हैं ये बेटियाँ.... ।

#श्वेताबर्णवाल 

4 comments:

Unknown said...

Absolutely right mam

Unknown said...

Absolutely right mam

Unknown said...

One of ur best words.....which can not be explained either this....once again ...perfectly said ..mam

Unknown said...

Wow..!
It's amazing...

ऐ विधाता...!

 ऐ विधाता...! ना जाने तू कैसे खेल खिलाता है...  किसी पे अपना सारा प्यार लुटाते हो, और किसी को जीवन भर तरसाते हो,  कोई लाखों की किस्मत का माल...