Thursday, 11 January 2018

एक पति की अभिव्यक्ति अपनी पत्नी के लिए...

चाह 

चाह नहीं मैं सिंदूर बन, 
तेरी मांग पे सज जाऊँ, 
चाह नहीं मैं तेरे गौरव को, 
पग-पग पे कुचलता जाऊँ... 

चाह नहीं मैं मंगलसुत्र बन, 
तेरे तन पे अपना हक जताऊं, 
तेरी इक्षाओं और ख्वाइशों का, 
गला घोंट मैं इतराऊं... 

चाह नहीं मैं बिछुआ बन, 
तेरे कदमो को चूमता जाऊँ, 
तेरे पैर की बेड़ी बन मैं,
तेरी उड़ान कुचल ना जाऊँ... 

चाह नहीं मैं तेरे हाथों का
कंगन बन खनकता रहुंँ,
रसमो-रिवाज़ की बेड़ियों मे, 
मैं तुझे जकड़ता जाऊँ...

चाहूँ तुझे मैं जीवन की
हर खुशियाँ दे पाऊँ,
तेरे स्वाभिमान की ख़ातिर,
हर एक से मैं लड़ जाऊँ...

चाहूँ तेरे कदमों को वो पंख देना, 
उड़ सके तू उन्मुक्त गगन मे, 
भर सके तू ऊँची उड़ान,
छु सके तु कामयाबी की बुलंदियों को...

चाहूँ मैं तेरे दिल में विश्वास भरना, 
तेरी आँखों में सपने और उम्मीदें भरना, 
चाहूँ तेरे सोए अरमानों को जगाना, 
बस झिलमिलाता रहे तेरा जीवन अंगना... 


#SwetaPrakash 

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