Wednesday, 10 January 2018

दर्द...

दर्द से दोस्ती हो गयी,
ज़िन्दगी बेदर्द सी हो गई,
मैं रोती रही रात भर,
जब सारा जमाना सोता रहा,
आँसू भी थक कर सूख गए,
खुशियाँ भी सारे रूठ गए,
उठा लिया अब कागज-कलम,
लिखने लगे हम अहसास-ओ-गम,
दर्द शब्दों में सिमटते गये,
जज़्बात गज़ल बन बिकते गये,
बढ़ रहे थे सभी कामयाबी की ओर,
मैं चाँद सा बादलों मे छिपती रही,
लोग रौंदते हुए आगे बढ़ते रहे,
कभी हमे तो कभी हमारे सपनों को...
हर पग पे लोग रंग बदलते मिले,
हम आज भी वहीं हैं जहाँ से चले...



#SwetaBarnwal 

No comments:

ऐ विधाता...!

 ऐ विधाता...! ना जाने तू कैसे खेल खिलाता है...  किसी पे अपना सारा प्यार लुटाते हो, और किसी को जीवन भर तरसाते हो,  कोई लाखों की किस्मत का माल...