बैठे थे यूँ ही तन्हाई में,
याद आया कोई इस पुरवाई मे,
था कोई एक साथी पुराना,
यादों में था उसका आना जाना,
वो मेरा कोई आम दोस्त ना था,
बहुत ही खास था रिश्ता हमारा,
एक अनोखा बंधन था हमारे बीच,
समझदारी और अहसासों की,
दिलों के तार जुड़े थे हमारे,
फ़िर भी हमने एक दूजे का हाथ ना थामा
रस्मो रिवाज़ों से बंधे थे हम,
दुनिया के संग चले थे हम,
हर मुश्किलों मे हौसला बढ़ाया था मेरा,
अंधेरे रास्तों पर जिसने थामा था मुझे,
मेरे हर कदम पर सराहा था तुमने,
गलतियों पे प्यार से सिखाया था तुमने,
मेरे हौसले को परवाज़ दिया तुमने,
लड़खड़ाये जो कदम आवाज़ दिया तुमने,
अचानक किसी मोड़ पे ऐसी आंधी चली,
खो गई अपनी वो दोस्ती ना जाने किस गली,
नज़र लग गई थी शायद उसको जमाने की,
आज फिर स्त्री और पुरुष की दोस्ती बेमानी हो गई...
#SwetaBarnwal

याद आया कोई इस पुरवाई मे,
था कोई एक साथी पुराना,
यादों में था उसका आना जाना,
वो मेरा कोई आम दोस्त ना था,
बहुत ही खास था रिश्ता हमारा,
एक अनोखा बंधन था हमारे बीच,
समझदारी और अहसासों की,
दिलों के तार जुड़े थे हमारे,
फ़िर भी हमने एक दूजे का हाथ ना थामा
रस्मो रिवाज़ों से बंधे थे हम,
दुनिया के संग चले थे हम,
हर मुश्किलों मे हौसला बढ़ाया था मेरा,
अंधेरे रास्तों पर जिसने थामा था मुझे,
मेरे हर कदम पर सराहा था तुमने,
गलतियों पे प्यार से सिखाया था तुमने,
मेरे हौसले को परवाज़ दिया तुमने,
लड़खड़ाये जो कदम आवाज़ दिया तुमने,
अचानक किसी मोड़ पे ऐसी आंधी चली,
खो गई अपनी वो दोस्ती ना जाने किस गली,
नज़र लग गई थी शायद उसको जमाने की,
आज फिर स्त्री और पुरुष की दोस्ती बेमानी हो गई...
#SwetaBarnwal

2 comments:
बिलकुल सही कहा है आपने...
आज के दौर में स्त्री और पुरुष के बीच सच्ची दोस्ती होना, एक स्वप्न जैसा है.
या तो मुमकिन नहीं या फिर मुकम्मल नहीं...
आदरणीय...
उत्साहवर्धन के लिए आपका धन्यवाद... 🙏🏻
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