अपनी बंजर पड़ी ज़िंदगी को संवारते रही,
जो टूट गया साख से उसको फ़िर जोड़ती रही,
सारी ज़िंदगी निकल गई अपनी कश्मकश में,
रात हुआ तो आँसुओं से तकिये को भिगोते रही,
दफ्न कर दिया अपनी ख्वाहिशों को कब्र में,
फ़िर ताउम्र उस कब्र को मैं खोदती रही,
दर्द का बवंडर ले उड़ा मेरी खुशियों को,
गुब्बार की भांति हर पल मैं फ़िर भटकती रही,
कितने प्यार से यादों को तेरी संजोया था मैंने,
अब उन यादों की आग में खुद को जलाती रही,
बाकी बची है कुछ ही साँसें अपनी उधार की,
मौत से पहले कई बार ख़ुद को मैं मारती रही,
किसी की बद्दुआ थी या थी कोई मेरी ही ख़ता,
मैं जितना सुलझाती रही ज़िन्दगी उलझती रही,
अब अपने होने का एहसास भी ख़त्म होने लगा,
गुमनामी के अंधेरे मे यूं जैसे मैं गुम होती रही...
#SwetaBarnwal

जो टूट गया साख से उसको फ़िर जोड़ती रही,
सारी ज़िंदगी निकल गई अपनी कश्मकश में,
रात हुआ तो आँसुओं से तकिये को भिगोते रही,
दफ्न कर दिया अपनी ख्वाहिशों को कब्र में,
फ़िर ताउम्र उस कब्र को मैं खोदती रही,
दर्द का बवंडर ले उड़ा मेरी खुशियों को,
गुब्बार की भांति हर पल मैं फ़िर भटकती रही,
कितने प्यार से यादों को तेरी संजोया था मैंने,
अब उन यादों की आग में खुद को जलाती रही,
बाकी बची है कुछ ही साँसें अपनी उधार की,
मौत से पहले कई बार ख़ुद को मैं मारती रही,
किसी की बद्दुआ थी या थी कोई मेरी ही ख़ता,
मैं जितना सुलझाती रही ज़िन्दगी उलझती रही,
अब अपने होने का एहसास भी ख़त्म होने लगा,
गुमनामी के अंधेरे मे यूं जैसे मैं गुम होती रही...
#SwetaBarnwal

No comments:
Post a Comment