Tuesday, 27 February 2018

मेरी कहानी मेरा किस्सा है तू, 
जो कभी ना जुदा हो ऐसा हिस्सा है तू... 

#SwetaBarnwal

Monday, 26 February 2018

इश्क़ उनसे किया,
कभी चाहा नहीं मुकम्मल हो,
बस इतनी सी थी ख्वाइश,
रिश्ता जहां मे अपना अव्वल हो...

#SwetaBarnwal
आज जो तेरी ज़िन्दगी का हिस्सा हैं हम, 
ना जाने कब कोई किस्सा बन जाएं.... 😢

#SwetaBarnwal 
नसीबों से मिले थे हम,
अहसासों से करीब आये हम 
बेखुदी फ़िर ऐसी हुई,
जज़्बातों से भी दूर हुए हम...

#SwetaBarnwal
बड़ी शिद्दत से चाहा था जिसे एक बार,
वो  ही तार-तार कर गया कई बार... 😢

#SwetaBarnwal
काश इन बहते आँसुओं मे वो असर आ जाए,
उनकी याद में निकले और उनको ख़बर हो जाए...

#SwetaBarnwal
ना ही कोई शिकवा रही, 
ना ही कोई गिला रहा,
जब से हुई है तुझसे मोहब्बत,
साथ आँसुओं का काफिला रहा...

#SwetaBarnwal

Sunday, 25 February 2018

गम ना कर,
यही फितरत है इंसानों की,
मौसम और वक़्त से भी तेज,
इनकी चाहत बदलती है... 😢

#SwetaBarnwal
किसी के दर्द की दवा,
किसी के गम का इलाज़,
लोगों के बीच मशहूर हूँ मैं, 
दुआओं की तरह...

#SwetaBarnwal

Saturday, 24 February 2018

इस कदर औरतें बाज़ारू ना होती,
गर मर्दों का ईमान डोला ना होता...

#SwetaBarnwal 


रिश्तों मे हम कभी किसी को आजमाते नहीं, 
पर जो हमे आजमाते हैं उन्हें हम अपनाते नहीं...

#SwetaBarnwal

Friday, 23 February 2018

गैरों के दिए ज़ख्मों पर 
आँसू क्यूँ बहाना,
अंधेरा होने पर हमने अक्सर अपने साये को भी 
साथ छोड़ता देखा है... 

#SwetaPrakash 

औकात की तुम बात ना करो यारों 
हम भी अपने दिल मे जज़्बात लिए घूमते हैं, 
डर जाते हैं लोग अक्सर अपनी ही परछाइ से,
हम अपनी हथेली पे जान लिए घूमते हैं...

#SwetaPrakash 
ये उसकी कोई मजबूरी थी, 
या फिर महज़ एक इत्तेफाक था, 
वो हमसे मिलने आए, 
जिसने कभी हमे ठुकराया था...

#SwetaPrakash 
नज़रों से नज़रें मिली, 
और दिल की बात हो जाए, 
मेरे नाम से धड़के दिल उनका, 
ऐसे हालात हो जाए, 
तमन्ना है हमारी 
उनसे इश्क़ करने की, 
बस अकेले में एक बार, 
इत्तेफाकन मुलाकात हो जाए... 

#SwetaPrakash 

तुझसे मिलना भी इत्तेफाक था, 
मिल कर बिछड़ना भी इत्तेफाक था,
मेरी ज़िन्दगी जो बर्बाद हुई,
वो भी बस एक इत्तेफाक था...

#SwetaPrakash 
हर बार मैं ही क्यूँ कहूँ उससे, 
कि बात कर लिया करे मुझसे, 
क्या उसे ख़बर नहीं,
कि दिल नहीं लगता मेरा बिना उसके...

#SwetaPrakash 
जितना चाहे कर लो तुम नज़रअंदाज़ हमे,
अहसास उस वक़्त होगा जब हम नज़र नहीं आएंगे...

#SwetaPrakash 

Thursday, 22 February 2018

इसे इत्तेफाक कहो या फ़िर कोई हकीक़त, 
आँखें जब भी बरसी वजह कोई अपना था...

#SwetaBarnwal 

" मेरे मन के अंदर "

" मेरे मन के अंदर 



बेमंज़र सा मंज़र है, 
मेरे मन के अंदर... 
विरानी सी फैली है,
मेरे मन के अंदर... 

सोलह श्रृंगार कर तुम, 
आ जाओ जीवन में,
खुशियाँ बिखेर दो  तुम, 
मेरे मन के अंदर... 

बन जाओ तुम मेरी,
है एक यही तमन्ना,
धड़कन बन बस जाओ,
मेरे मन के अंदर...

(एक प्रेमी का अपनी प्रेमिका को समर्पित) 

#SwetaBarnwal 

"जरूरी तो नहीं "

"जरूरी तो नहीं "



गुम हूँ मैं तेरे प्यार में, 
ये इज़हार जरूरी तो नहीं, 
खुद को भूल बैठी हूँ मैं, 
ये इकरार जरूरी तो नहीं, 
हर बात होठों से कही जाये, 
इश्क़ मे ये जरूरी तो नहीं, 
मुझे तुझसे इश्क़ है और रहेगा, 
पर उसकी नुमाइश जरूरी तो नहीं, 
मन से मन का मिलन हो जाए बस, 
तन से तन का मिलन जरूरी तो नहीं...

#SwetaBarnwal 

मैं औरत हूँ...

मैं औरत हूँ
मैं जीना चाहती हूँ 
अपनी शर्तों पर ज़िन्दगी,
है ख़ुद से प्यार मुझे, 
नहीं जीना मुझे दोहरी ज़िन्दगी, 
मुझे सीता और सावित्री नहीं बनना, 
ना सतीत्व की आग में है जलना, 
नहीं शौख है मुझे  देवी बनने का,
इंसान हूँ, यही बहुत है मेरे लिए,
नहीं जीना मुझे नपी-तुली ज़िंदगी, 
हर वक़्त मर्यादा के बंधनों में,
नहीं कैद रहना है मुझको,
मेरी मर्यादा कपड़ों से होती है,
खींची गई है मेरे लिए लक्ष्मण रेखा, 
घर हो या बाहर, चुप रहती हूँ, 
घुटती और लूटती रहती हूँ,
देवी बना कर पूजते हैं मुझे,
पर हकीक़त मे भोग्या समझते हैं मुझे,
बच्चे पैदा करने की मशीन से ज्यादा, 
नहीं है कोई औकात मेरी,
घर के किसी फैसले मे,
नहीं चाहिए किसी को राय मेरी,
सारे नियम और परम्पराएं मेरे लिए, 
पालन करना है हमे बिना सवाल किए, 
हमे स्वतंत्रता और प्रेम का अधिकार नहीं, 
नाहीं अपनी कोख जने पर अधिकार है,
मैं जब तक मौन हूँ घर आबाद है, 
मेरी आवाज़ उठाते ही सब बर्बाद है, 
तुम मुझे जला सकते हो, मार सकते हो, 
मेरी आवाज़ को दबा सकते हो, 
क्यूंकि मैं एक औरत हूँ,
फिर भी एक सुकून होगा मन मे, 
कि मैंने तुम्हारी झूठी सत्ता को 
स्वीकारा नहीं,
मैं सच्चाई हूँ,
मैं औरत हूँ....

#SwetaBarnwal 

Wednesday, 21 February 2018

हम थोड़े से बेख़बर क्या हुए, 
आप तो बेवफ़ा हो गए... 

#SwetaBarnwal 

ऐ ज़िन्दगी...!

ऐ ज़िन्दगी...! 
थोड़ा और आज़मा ले मुझे, 
कि अभी मुझमें ज़िंदगी बाकी है... 
कर ले तू थोड़ा और सितम, 
कि अभी मुझमें हौसला बाकी है...
कितने राज़ छुपा रखे हैं तूने,
कर ले तू आज हर आज़माइश,
फिर ना मिलेगा कोई तुझे ऐसा,
कि अभी मुझमें और जुनून बाकी है...
कहीं ऐसा ना हो मेरा वक़्त ख़तम हो, 
और तेरे इम्तेहान शेष रह जाए, 
फिर ना कहना मैंने मौका ना दिया,
क्या पता कब आख़िरी शाम आ जाए...

#SwetaBarnwal 

कच्चे रिश्ते...

कुछ रिश्ते क्षण में टूट गए, 
कुछ बिन बोले ही रूठ गए, 
कुछ साथ चले फ़िर छुट गए, 
काँच के जैसे सारे फ़ुट गए... 

यादों की गठरी खोलूँ जो,
इन आँखों से गर कुछ बोलूँ तो,.
बिन बारिश फ़िर बरसात हुई, 
और तन्हाई का आलम साथ हुई...

जिस को समझा था अपना,
बन कर निकला वो एक सपना,
मतलब सबके सधते गए,
हम यार ज़ुदा होते गए...

रिश्ते.! जैसे रेत की बनी दीवारें हैं, 
यहाँ कोई अपना नहीं हमारे हैं, 
जिन्हें अपना अपना कहते हैं, 
बस वही हमे लूट ले जाते हैं... 

#SwetaBarnwal 

Tuesday, 20 February 2018

बड़े नाज़ुक होते हैं ये दिलों के रिश्ते, 
होठों पे लाओ तो अक्सर टूट जाते हैं,
डरती हूं इज़हार करने से,
खिलौना समझ अक्सर लोग खेल जाते हैं,
जानती हूँ, हसीन होता है ये प्यार का रिश्ता,
पर धोखे से अक्सर सारे ख्वाब टूट जाते हैं...

#SwetaBarnwal

ये मासूमियत 


सुबह प्रातः काल उठ कर पढ़ना अक्सर लोगों को भाता नहीं. मेरी भी आदत कुछ ऐसी ही थी. सारी रात जाग कर कितना भी पढ़ लूँ, पर सुबह उठने के नाम से नानी याद आती थी. वैसे ये आदत आज भी नहीं गई है. खैर ये उस समय की बात है जब हम नौवीं कक्षा मे थे. पिताजी हमारे सुबह के चार बजे रोजाना उठ कर बागवानी और योगा किया करते थे. रोज हमे और हमारी को भी वो ५ :00 बजे सुबह उठा दिया करते थे पढ़ने को. बहुत गुस्सा भी आता था और खीज भी होती थी. समझते थे कि वो जो कर रहे हैं, हमारी भलाई के लिए कर रहे हैं. पर क्या करें निन्द्रा देवी की हम पर असीम कृपा थी.
हमारा घर दोतल्ला हुआ करता था. एक दिन हमने कहा पिताजी हम ऊपर वाले कमरे में सोएंगे. पिताजी ने कहा कि फ़िर सुबह कैसे उठोगी तुम लोग. हम दोनों बहनों ने साथ मे कहा कि "अलार्म से". पिताजी को यकीन तो नहीं था, फिर भी हमे जाने दिया. उस वक़्त हमारे गाँवों में बिजली की बड़ी विकट स्थिति थी, वो आती कम और जाती  ज्यादा थी. इसलिए हम साथ मे लालटेन भी ले गए ऊपर कमरे में. उस दिन हमने पक्का मन बनाया कि सुबह उठकर पढ़ाई करेंगे और पिताजी को निराश नहीं होने देंगे.
ख़ैर रात को हम दृढ़ संकल्प हो, अलार्म लगा लालटेन की रोशनी को मध्यम कर दोनों बिस्तर के पास की ही कुर्सी पर रख सोने चले गए. आख़िर हमारी नींद खुली अलार्म से और हम दोनों बहनों ने अर्द्ध निन्द्रा मे ही हाथ बढ़ाया अलार्म को बंद करने के लिए.
पर हमारी बेवकूफी कहिए या नींद का आलम की हम दोनों ने ही अलार्म बंद करने के लिए लालटेन की  क्नाॅब (knob) को घुमाना शुरू कर दिया. नींद मे इतनी बेखबरी और मदहोशी थी कि हमे ये भी ख़्याल ना आया कि अलार्म बंद करने के लिए लालटेन की knob नहीं घड़ी की स्विच प्रेस करनी थी. इसी बेख्याली मे हमने लालटेन ऑफ़ कर दिया पर वो अलार्म बंद ना हुआ. अंततः हम दोनों बहनें कान पे तकिया रख सो गए. हमे समझ ही नहीं आया कि आख़िर वो अलार्म बंद क्यूँ नहीं हुआ. ख़ैर बाद में हमे बहुत डांट पड़ी माँ पिताजी से हमारी कुंभकरणी निन्द्रा के लिए...
आज भी हम उस रात को याद करते हैं तो हमारी हंसी नहीं रुकती ये सोच-सोच कर कि सच में कैसी नींद थी हमारी...

#SwetaBarnwal 

ये उन दिनों की बात है 



ये उन दिनों की बात है जब मोबाइल फोन्स दूरदर्शन पे ही दिखा करते थे। जब mail, orkut,  what's up, facebook, twitter in सबके नाम भी नहीं सुने थे। अपने दिल की बात लोग कागजों पे बयान करते थे, जिसे हम खत कहते
हैं। मैं (सपना) नौवीं की कक्षा में पढ़ने वाली एक शांत लड़की हुआ करती थी। हमारे विद्यालय के एक शिक्षक मुझे बहुत भाते थे। उनका अंदाज़, उनकी आवाज, उनका व्यक्तित्व बहूत ही मनमोहक था। हर वक़्त दिल बस उनके ही ख्यालों मे गुम रहता था। पता नहीं वो अहसास कैसा था, पर जो भी था बहुत मधुर और बिल्कुल पाक था। वो भी मुझे बहुत सराहते थे, बहुत प्रोत्साहित करते थे। हर विद्यार्थी से ज्यादा मुझे मान देते थे। इसकी एक वजह शायद ये भी थी कि मैं एक होनहार विद्यार्थी थी।

धीरे-धीरे वक़्त गुज़रता गया और मेरी दसवीं की परीक्षा के दिन आ गए। और फिर वो दिन भी आया जब हमारा रिश्ता उस विद्यालय से ख़तम हो गया। पर वो कसक दिल से नहीं गई, वो जज़्बात दिल में ही रहे। उस वक़्त हमारे लिए प्यार का मतलब सिर्फ़ परिवार से शुरू हो परिवार पे ही खत्म होता था। अपने शिक्षक के लिए मेरे मन में जो अहसास था उसका क्या नाम होना चाहिए, ये मुझे पता नहीं था उस वक़्त। बस उनका सामने होना मेरे लिए बहुत बड़ी बात होती थी। मैं उस रिश्ते को एक नाम देना चाहती थी, पर क्या..? कोई आभास ना था मुझे और ना ही रिश्तों के नाम पता थे मुझे उन दिनों। यूं ही कश्मकश मे ज़िन्दगी गुज़रती जा रही थी। आख़िर एक दिन मैंने उन्हें अपने घर बुलाया और कहा कि आप मुझे बहुत अच्छे लगते हैं और मुझे बहुत पसंद है, मैं आपको अपने साथ रिश्ते की डोर मे बांधना चाहती हूँ। आपसे बहुत प्यार करती हूँ मैं और आपको अपना संरक्षक मानती हूँ। मेरी इन बातों को सुन वो बहुत अचंभित हुए, उन्हें यकीनन ऐसी उम्मीद नहीं रही होगी।

मैं भले उस वक़्त मासूम और नादान थी पर वो एक जिम्मेवार, पारिवारिक व्यक्ति थे। वक़्त औरउम्र का लंबा फासला था हमारे बीच। मेरी बातों पे वो अपनी प्रतिक्रिया ज़ाहिर करते उससे पहले ही शायद उन्हें मेरी हाथों में वो सूत्र नज़र आ गया जो एक बहन अपने भाई की कलाई पे बांधती है, #राखी। उस दिन रक्षा बंधन था। उन्होनें मुझे गले से लगा लिया और कहा, " तेरे जैसी बहन भला किसे नहीं चाहिए"। और अंततः इस कदर मैंने हमारे उस खूबसूरत से रिश्ते को एक खूबसूरत सा नाम दे दिया। शायद उस वक़्त दुनिया का सबसे खूबसूरत रिश्ता वही था मेरी नज़र में। भाई बहन का प्यार, नोंक झोंक, मस्ती मजाक, दोस्ती, एक मजबूत सुरक्षा कवच, सब कुछ तो मिल गया था मुझे उस एक रिश्ते में।

सच ही कहा है किसी ने उन दिनों बचपन में प्यार की परिभाषा बड़ी ही खूबसूरत और सादगी पूर्ण हुआ करती थी। आज जब देखती हूँ इस बदलते समाज को तो सोचती हूँ कि आखिर कहां गुम हो गई वो मासूमियत, वो अल्हड़पन, वो बेबाकपन, वो मासूम बचपन। कहां खो गए वो निःस्वार्थ रिश्ते और वो पाकिज़ा मोहब्बत।सच मे #"ये_उन_दिनों_की_बात_है".....

#SwetaBarnwal 

Monday, 19 February 2018

कुछ वक़्त मैं तेरा साथ चाहती हूँ,
आँखों में अनदेखी बरसात चाहती हूँ,
एक बार फिर वो हसीन मुलाकात चाहती हूँ,
कभी ना बीते जो, मैं वो रात चाहती हूँ,
तेरे साथ चल सकूं कुछ कदम,
मैं वो खुशनुमा सफ़र साथ चाहती हूँ, 
सुना है आज भी बहुत चाहते हो तुम मुझे,
बस होठों पर एक बार फिर इज़हार चाहती हूँ...

#SwetaBarnwal

वो गज़रे वाली 



आज एक अजीब सी बात हुई...
रेड लाइट पे जैसे ही हमारी बाइक रुकी एक छोटी सी बच्ची हाथों मे गज़रा लिए हमारे समीप आई और मेरे पति महोदय #अमित से कहने लगी, बाबूजी ये गजरा ले लो ना, मैडम पर बहुत जचेगी. मुझे गजरे लगाने का कोई शौख ना था, सो मैंने मना कर दिया और कहा कि ये सब फीज़ुल खर्ची है. तभी सिग्नल ग्रीन होते ही हमारी बाइक आगे निकल गई. लेकिन ना जाने क्यूँ मन बेचैन हो गया था, लग रहा था जैसे पीछे कुछ छूट गया हो. ख़ैर हमे मंदिर जाना था, सो हम मंदिर पहुंच गए. हमने फूल-माला, प्रसाद लिया, मंदिर के अंदर गए, दर्शन किए सोचा अब मन शांत हो जाएगा. पर कुछ खास फर्क नहीं पड़ा. मंदिर में पूजा-आरती के बाद अमित जी ने मेरे हाथ में १०१/ रु. दिए और कहा #नीलम ये दान पेटी में डाल दो. अचानक मेरे मन के भीतर कुछ टूट सा गया जैसे. उस वक़्त तो मैंने कुछ ना कहा, पैसे दानपेटी मे डाला और प्रणाम कर मंदिर से बाहर आ गई...

मेरे मन के भीतर का कोलाहल कुछ ज्यादा ही बढ़ चुका था अब. कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था.  मैंने अमित से कहा घर चलो, तबयत कुछ ठीक नहीं लग रही. उन्होंने कई बार जानने की कोशिश की, पूछा क्या हुआ नीलम. पर बताती क्या मैं उन्हें. वजह तो मुझे खुद भी मालूम नहीं था. आख़िर हम घर की ओर चल दिए. वापसी मे फ़िर हमारी बाइक रेड लाइट पे रुकी. मेरी नज़र इधर-उधर दौड़ने लगी, शायद किसी को ढूंढ रही थी. पर किसे, पता नहीं. अचानक मुझे वो गज़रे वाली लड़की नज़र आई. मैंने अमित को कहा बाइक किनारे लगाने को और चली गई उस लड़की के पास. अमित ने आवाज़ भी लगाई, क्या हुआ नीलम रूको भी. पर मुझ से रुका नहीं गया.

मैंने पीछे से उस लड़की के कंधे पर हाथ रखा वो घबरा कर मेरी ओर मुड़ी और मुस्कुरा कर बोली, मैडम आप. मेरे पूछने पर उसने अपना नाम #सुरभि बताया. मैंने कहा, सारे गज़रे बिक गए. उसके चेहरे पर चिंता के भाव उभर आए, कहा नहीं
मैडम..! आज तो एक भी गज़रा नहीं बिका. फ़िर वो अपने बारे में कहती चली गई और मैं वहीं खड़ी धूप में सुनती रही. घर में दो छोटे भाई बहनों को छोड़ उनकी रोटी का इंतज़ाम करने सुबह से ही निकली थी वो घर से. मन बहुत व्यथित हुआ ये सुनकर.मैंने पूछा कितने गज़रे हैं तेरे पास और कितना लोगी सारे गज़रे का? पहले तो वो हंसी, फिर बोली, क्या करोगी मैडम आप इतने गज़रों का, आपको तो शौख भी नहीं है. उसकी ये बातें सही मे मुझे विचलित कर गई. उसने पूरे गज़रे के २५०/ रु बताए. मैंने उससे सारे गज़रे लिए और उसे ५०० पकड़ाए, कहा रख लो और मेरी ओर से कुछ ले लेना अपने भाई-बहनों के लिए. पर उसने २५०/ रु रखे और शेष मुझे लौटा दिया. सुरभि ने कहा, मैडम आपने बिना जरूरत के मेरे गज़रों को ले लिया मेरे लिए तो यही बहूत है. आज तो मुझे रोज से ज्यादा पैसे भी मिले और दो घंटे मे ही घर लौट जाऊंगी. इतना कह वो मुस्कुराती हुई चली गई और मेरी नज़रें दूर तक उसे देखती रही. ओझल होने से पहले उसने मुझे पलट कर देखा और मुस्कुरा दिया.

इस वक़्त मेरा मन पूरी तरह शांत हो चुका था और मैं असीम खुशी भी महसूस कर रही थी. अमित दूर खड़े सब देख और सून रहे थे. पास आते ही कहा, मैडम अब तो तबयत ठीक हो गई ना. मैं खिलखिला उठी. वो सारे गज़रे ले कर हम घर के पास के ही मंदिर मे चढ़ा आए और उनमे से एक गज़रा अमित ने मेरे बालों में लगा दिया. मेरा रोम-रोम खिल उठा.

अक्सर ज़िन्दगी की खुशियाँ इन छोटे-छोटे पलों में होती है और हम तलाशते कहीं और हैं...

#SwetaBarnwal 
बेटियों को जंजीरों में बांधने वाले, 
थोड़ा बेटों को भी डाँट लिया करो, 
छोटे कपड़े ग़लत है बेटियों के
तो ओछी नज़रें कहाँ सही है बेटों के.

जल्दी घर आना, कहीं रुक मत जाना,
सही कहते हो बेटियों से,
पर यही बात फिर क्यूँ नहीं कहते बेटों से,
क्यूँ चुप्पी सध जाती है होंठों पे,

बेटियों के mobile check करना याद है, 
भूल क्यूँ जाते हो बेटों के internet को, 
बेटियों के दोस्त भी गंवारा नहीं तुझको, 
बेटों के आवारागर्दी पे भी नज़रअंदाज़. 

सभ्यता और संस्कृति के नाम पर 
हर बार बेटियों को सूली पर चढ़ाने वाले, 
बंद करो अपनी ये दोहरी नीति 
थोड़ा समझा लो बेटों को भी तो जी ले बेटियाँ भी... 


#SwetaBarnwal 

Saturday, 17 February 2018

शादी का पहला दिन...

आज भी याद है मुझे 
हमारी शादी का वो दिन
खुशी और गम दोनों के बीच
मिलन और जुदाई का संगम,
नए रिश्तों में बंधने की खुशी थी
तो पुराने रिश्तों से दूरी का दर्द भी,

आज भी याद है मुझे 
हमारी शादी का वो दिन
मंडप पे बैठी थी मैं 
चारों ओर सारे संबंधी थे, 
फिर भी अकेलापन था, 
ना जाने वो कैसा अहसास था, 

आज भी याद है मुझे 
हमारी शादी का वो दिन
पंडित जी ने कहा जब
कन्यादान संपन्न हुआ यजमान,
मानो जान ही निकल गई मेरी,
जब बाबुल ने मेरा हाथ तुम्हारे हाथ में दिया,

आज भी याद है मुझे 
हमारी शादी का वो दिन,
माँ-बाबा की लाडली थी मैं,
इन रस्मों ने पल मे बेगाना कर दिया,
इस सोच ने निष्प्राण कर दिया मुझे,
मूर्छित हो गिर पड़ी थी मैं, 

आज भी याद है मुझे 
हमारी शादी का वो दिन,
अगली सुबह आया वक़्त विदाई का,
खुशी और गम से नम थी हर आंखें,
आज से पराई हो गई मैं उनके लिए,
दुनिया का यही दस्तूर सुनाया सबने,

आज भी याद है मुझे 
हमारी शादी का वो दिन,
पैरों मे पायल, बिछुआ और माहवार लिए, 
ससुराल की चौखट पर पहली बार पांव रखा, 
आंखों में अनगिनत सपने और दिल मे अरमान लिए 
पुरानी ज़िन्दगी को छोड़ नई ज़िंदगी का आह्वान किया, 

आज भी याद है मुझे 
हमारी शादी का वो दिन,
लोगों की भीड़ मे संभालती कभी खुद को तो कभी घूँघट को, 
अल्हड़ बेटी से अचानक शिष्ट बहु का किरदार निभाने को, 
कर रही थी मैं हर तरह से ख़ुद को तैयार, 
कोई चुक ना हो मुझसे, इसका भी था मुझे ख्याल... 

आज भी याद है मुझे 
हमारी शादी का वो दिन,
आख़िर में वो घड़ी भी आई, जिसका इंतज़ार हर जोड़े को होता है,
यूँ सहमी-सकुचाई सी ख़ुद मे सिमटी हुई तक रही थी आपकी राह,
आपका यूँ दबे पांव आना, हमारा घूँघट उठाना और धीमे से कहना,
हाए ये खूबसूरती और मासूमियत, कोई खता ना हो जाए हमसे... 

आज भी याद है मुझे 
हमारी शादी का वो दिन,
आपका इस कदर हमे बाहों मे भरना और प्यारी बातें करना,
पूरी ज़िन्दगी के सपने एक रात मे हमने आपके साथ देख लिए,
इस दुनिया से अलग है आपकी अदा और आपका अंदाज़, 
आपका साथ, प्यार और विश्वास ने आसान कर दिया हमारा सफ़र...

आज भी याद है मुझे 
हमारी शादी का वो दिन...

#SwetaBarnwal 
हमने अपने दिल के दर्द को शब्दों में पिरोया 
और उन्हें भेज दिया, 
उन्होनें पढ़ा और कहा, वाह जी वाह, 
आप तो शायर हो गए...

#SwetaBarnwal 
यादों को सीने मे संजो कर रख,
बीते लम्हों को दिलों में संजो कर रख,
अश्कों को पलकों से छुपा के रख,
जालिम है जमाना, जज़्बातों को दबा के रख...

#SwetaBarnwal

Friday, 16 February 2018

पहले तो सिर्फ़ मोहब्बत की तारीफें ही सुनी थी, 
उससे मोहब्बत की तो उसकी तकलीफें नज़र आई...

#SwetaBarnwal 

Thursday, 15 February 2018

ना कोई वादा कर, ना कोई इरादा कर,
बस मिलने की चाहत हद से ज्यादा कर...

#SwetaBarnwal 
सदियाँ बीत गई, 
मगर तेरी आदत नहीं बदली,
काश मैं तेरी मोहब्बत नहीं,
तेरी आदत होती...

#SwetaBarnwal 
दुनिया ने कब किसका दिया है साथ, 
तुम यूं ही अकेले चलते रहो जब तक सांस.. 

#SwetaBarnwal 
तेरी मोहब्बत का फलसफा भी अज़ीब है, 
ना तुझे भूलता है और ना किसी का होने देता है... 

#SwetaBarnwal 
कुछ ख्वाब झूठे हैं, 
कुछ ख्वाहिशें अधूरे हैं, 
पर ज़िन्दगी के लिए, 
थोड़ी गलतफहमियां जरूरी है... 

#SwetaBarnwal 
वक़्त कहता है उम्र हो चली है अब थोड़ा संज़ीदा हो ले, 
और उम्र कहती है अभी थोड़ी और तु नादांनियां कर ले...

#SwetaBarnwal 
ख़ुदा करे हमारी चाहत में भी वो मुकाम आए,,, 
हम याद करें तुमको और तुम्हें ढेर सारी हिचकियां आये...

#SwetaBarnwal

Wednesday, 14 February 2018

रख हौसला ऐ मुसाफिर
इस कदर बेचैन ना हो,
वक़्त तेरा भी आएगा,
तू अपना चैन ना खो...

#SwetaBarnwal
मेरे इस दिल की एक ही फरमाइश है, 
तु मेरी ज़िंदगी की आखिरी ख्वाइश है...

#SwetaBarnwal 
इस कदर ये दिल कभी कभी बेचैन हो उठता है,
याद तेरी आती है और नम पलकें हो जाती है...

#SwetaBarnwal 
तुझसे मिल के यूँ लगता है,
जैसे जन्मों का बंधन है अपना...

#SwetaBarnwal 
एक बार रुक जा, मुड़ के देख जरा,
तेरे पीछे है हम, छोड़ ये सारा जहां...

#SwetaBarnwal 
किसी को चाहना ये तो दिल की बात है,
दिल किसी पे आ जाना ये किस्मत की बात है...

#SwetaBarnwal 
चाहत है कि कोई मुझको भी समझ सके,
उनके दिल में क्या है वो एक बार कह सके...

#SwetaBarnwal 

Monday, 12 February 2018

किन्नर की आत्मकथा...

किन्नर की आत्मकथा 



पुरुष के शरीर का लिबास ओढ़े, 
शायद, मैं एक औरत हूँ,
वास्तव में ना मैं एक पुरुष हूँ
और ना ही मैं सम्पूर्ण औरत हूँ
क्या हूँ मैं ये ख़ुद को भी नहीं पता, 
शायद विधाता की एक भूल का नतीजा हूँ मैं 
समाज हमे ठुकराता है, घृणा करता है, 
और बनाने वाले ने कभी अपनाया नहीं, 
हम वो हैं, जो होकर भी कहीं नहीं है ं
हमारा होना शर्मसार करता है लोगों को, 
बचपन तो फिर भी कट जाता है अपना,
पर जवानी हमे जीने नहीं देती,
पुरुष का तन हमे आकर्षित करता है,
दिल हमारा उनकी ओर खींचता है, 
पर ऊपर वाले ने हमारे लिए 
नहीं बनाया है किसी को इस संसार में,
हमारी दुआएं सबके मन को भाये,
पर हम सबको कोई भी ना अपनाए,
हम रोते हैं चिल्लाते हैं पर हमारी चीख़
खो जाती है कहीं इस विशाल संसार के
अंधकार और क्षुद्रता से भरे सोच के भंवर में, 
घुट जाती है हमारी आवाज़ हमारे ही अंदर...
बस एक टीस सी दिल में हर वक़्त चुभती है, 
क्या हमारा अधूरा होना कोई अभिशाप है...!


#SwetaBarnwal 

Sunday, 11 February 2018

कुछ तो जादु है उनके लफ़्ज़ों में,
दिल मेरा और ख़रीद वो ले जाते हैं... 

#SwetaBarnwal 
अंजाम पे पहुचूंगी मैं
आगाज़ से पहले,
कि वक़्त खु़द सुनाएगा मेरी कहानी
हौले - हौले...

#SwetaBarnwal 

मैं मर्द हूँ...

मैं मर्द हुंँ, हाँ मैं मर्द हूँ, 
ऊँचा कद, चौड़ा सीना, 
मूछों पे ताव और मन में अभिमान 
यही तो है एक मर्द की पहचान... 

मैं मर्द हुंँ, हाँ मैं मर्द हूँ, 
औरतों को पैर की जूती समझता हूँ, 
उसे खरीदुं, बेचुं, जलाउं या तड़पाउं,
एक भोग्या से ज्यादा नहीं है उसकी पहचान...

मैं मर्द हुंँ, हाँ मैं मर्द हूँ,
रस्मों-रिवाज़ों, व्रत-उपवास, नहीं मानता मैं,
क्यूंकि ये सब बनाया है औरतों के लिए हमने,
जिससे बचे ना उनके पास वक़्त और शक्ति... 

मैं मर्द हुंँ, हाँ मैं मर्द हूँ,
मेरे लिए कोई वस्त्र परिधान नहीं, कोई बंदिश नहीं, 
मैं दुनिया समाज के बंधनों से बिल्कुल आज़ाद हूँ, 
नाही कोई वादे से बँधा हूँ मैं, ना किसी कसम से... 

मैं मर्द हुंँ, हाँ मैं मर्द हूँ,
मुझे स्त्री चाहिए बिल्कुल अनछुई, कोमल, पवित्र, 
चाहे बनाना हो अर्धांगिनी या करना हो खिलवाड़, 
औरतें रहे पर्दे मे, चाहे खोट हो मेरी नज़रों में...

मैं मर्द हुंँ, हाँ मैं मर्द हूँ,
मेरे लिए उम्र की कोई दीवार नहीं,
ढलती उम्र में भी कर सकता हूँ दूजा ब्याह,
वैधव्य का मुझ पर कोई बोझ नहीं...

मैं मर्द हुंँ, हाँ मैं मर्द हूँ,
उम्र की सीमा, वैधव्य और पर्दा ये सब औरतों के लिए है,
ताकि दबा कर रख सकूं उसे और कर सकूं अय्याशी,
मैं हूँ शक्ति, सामर्थ्य और सत्य, सारा जग मुझमे समाहित है...

मैं मर्द हुंँ, हाँ मैं मर्द हूँ,
मैं भले ही कोई महान कृत्य करूँ या ना करूँ,
मर्द रूप में जन्म लेना ही बहुत है मर्द कहलाने के लिए, 
जरूरी नहीं कि मैं निर्बल असहाय स्त्रियों की रक्षा करूँ...

मैं मर्द हुंँ, हाँ मैं मर्द हूँ,
मुझे किसी चरित्र के प्रमाण की जरूरत नहीं है,
क्यूंकि मैं स्त्री नहीं हूँ, मुझे दुनिया समाज का डर नहीं है,
मैं भूत, भविष्य और वर्तमान हर युग में परिपूर्ण हूँ...

मैं मर्द हुंँ, हाँ मैं मर्द हूँ...
मैं मर्द हुंँ, हाँ मैं मर्द हूँ...

#SwetaBarnwal 

Thursday, 8 February 2018

मैं हिंदी हूँ...

मैं हिंदी हूँ... 
मैं हिंदुस्तान के माथे पर एक बिंदी हूँ, 
मैं खुद इतिहास हूँ बीते जमाने की, 
एक अनकही अनसुनी कहानी भी हूँ मैं, 

मैं हिंदी हूँ... 
मैं सिर्फ एक भाषा ही नहीं हूँ,
भारत देश का गौरव भी हूँ मैं 
और इसका अभिमान भी हूँ मैं,

मैं हिंदी हूँ... 
मैं दास्तां हूँ भारत देश के अतीत का, 
मैं प्रतीक हूँ इस देश के वैभव का, 
संस्कृत मेरी आदि जगत जननी है,

मैं हिंदी हूँ... 
मैं हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा हूँ, 
इस देश के उत्थान की एकमात्र आशा हूँ मैं, 
सच्चाई, ईमानदारी और प्रेम की भाषा हूँ मैं,

मैं हिंदी हूँ...

#SwetaBarnwal 

नारी का वजूद

नारी के अंतः मन को, क्या कभी समझ ना कोई पाएगा,,,
दिल है जिसका प्यार का सागर, क्या कोई पार ना पाएगा... 

खुद हँसती है ख़ुद रोती है, कोई तुझको क्या समझाएगा,,,
तेरी शक्ति का कोई तोड़ नहीं, कोई तुझको क्या हराएगा... 

आँचल में तेरे दूध छुपा, आँखों में गंगाजल पानी है,,, 
दिल में तु अंगार लिए, होंठों पर प्यार की कहानी है... 

प्यार की एक मूरत है तू, देवत्व की तू निशानी है,,,
माँ है और बहन भी है तू, बेटी है तू और अर्धांगिनी है...

हर रिश्ते में परिपूर्ण है तू, हर रिश्ते का आधार है तू,,,
भगवान भी धरा पर जन्म लेते, पाने को जिसका दुलार है तू...

तुझ बिन सृष्टि का औचित्य नहीं, कौन ये तुझको याद दिलाएगा,,,
जग को तू ही जीवन देने वाली, कौन ये तुझको अब बतलाएगा...

घर को स्वर्ग बनाने वाली, तुझे अपनी लड़ाई लड़नी है,,,
अबला नहीं तू शक्ति है, ये बात दुनिया को समझानी है...

तुझे सीता बन अब नहीं जलना है, ना राधा बन तड़पना है,,,
तुझे मीरा बन ज़हर नहीं पीना है, अब दुर्गा बन बस लड़ना है...

अब तुझे खुद को ये समझाना होगा, दुनिया को दिखालाना होगा,,,
लक्ष्मी भी तू, दुर्गा भी तू, और वक़्त पड़े तो काली भी बन जाना होगा...

#SwetaBarnwal 

Wednesday, 7 February 2018

याद करो जो गुज़रे लम्हों को,
मेरी वफ़ा को समझ पाओगे तुम... 
गर आवाज़ हम ना लगाएं, 
तो भूल हमे भी जाओगे तुम...

#SwetaBarnwal 
मोहब्बत की बातें करना तुम्हें क्या खूब आता है,,,, 
पर क्या इतनी ही खूबसूरती से मोहब्बत करना भी आता है....

#SwetaBarnwal 
थक गई हूँ लोगों को आवाज़ देते देते,
अब जो आवाज़ देगा वही याद आयेगा...

#SwetaBarnwal

Monday, 5 February 2018

बहुत कुछ खोया है ज़िन्दगी में,
तराशा है कई बार ख़ुद को हमने, 
तब कहीं जाके ये मुकाम पाया है,
लोग हमे देख ये कहते हैं,
वाह क्या नसीब पाया है,
अब उन्हें कौन समझाए कि
हमने ख़ुद को जलाया है, 
तब जाकर ये उजाला पाया है...

#SwetaBarnwal 

Friday, 2 February 2018

नोंक झोंक मे ही ज़िन्दगी का असली मज़ा है,
वरना serious तो icu मे पड़ा patient भी है...

#SwetaBarnwal 

अच्छी लड़की...

नहीं हूँ मैं अच्छी लड़की 


नहीं हूँ मैं अच्छी लड़की... 
मैं लड़कों के साथ खेलती हूँ, 
लड़कों के जैसे कपड़े भी पहनती हूँ, 
जोर-ज़ोर से हँसती हूँ मैं
चिल्ला कर बोलती भी हूँ मैं

इसलिए तो नहीं हूँ मैं अच्छी लड़की...

मैं घूँघट भी नहीं करती, 
नाहीं मैं चुप्पी ओढ़ती हूँ, 
हर बात पे दुनिया से सवाल करती हूँ 
यदा कदा तुमसे बराबरी भी करती हूँ, 

इसलिए तो नहीं हूँ मैं अच्छी लड़की...

मेरी कई लड़कों से दोस्ती है, 
कुछ अलग ही अपनी हस्ती है, 
अपने अंदाज़ से ज़िन्दगी जीती हूँ 
बिना पूछे अपनी राय भी देती हूँ, 

इसलिए तो नहीं हूँ मैं अच्छी लड़की...

मेरे भी कुछ सपने कुछ अरमान हैं, 
मैं भी आगे बढ़ना चाहती हूँ 
आसमान को छूना चाहती हूँ, 
मैं लड़ती हूँ समाज से अपने हक़ के लिए, 

इसलिए तो नहीं हूँ मैं अच्छी लड़की...

मैं किसी भी अन्याय के विरुद्ध 
खुलकर आवाज उठाती हूँ,
बात नारी के अस्मिता की हो गर तो
मैं सहन नहीं कर पाती हूँ,

इसलिए तो नहीं हूँ मैं अच्छी लड़की... 

ग़लत इरादे से उठने वाले हाथों को तोड़ती हूँ मैं,
छिछोरी नज़रों को फोड़ती हुँ मैं,
मैं ख़ामोशी से सब कुछ नहीं सहती हूँ
मैं खुद की क्षमता को पहचानती हूँ

इसलिए तो नहीं हूँ मैं अच्छी लड़की...
हाँ बस इसलिए तो नहीं हूँ मैं अच्छी लड़की...

ऐ विधाता...!

 ऐ विधाता...! ना जाने तू कैसे खेल खिलाता है...  किसी पे अपना सारा प्यार लुटाते हो, और किसी को जीवन भर तरसाते हो,  कोई लाखों की किस्मत का माल...