Monday, 12 February 2018

किन्नर की आत्मकथा...

किन्नर की आत्मकथा 



पुरुष के शरीर का लिबास ओढ़े, 
शायद, मैं एक औरत हूँ,
वास्तव में ना मैं एक पुरुष हूँ
और ना ही मैं सम्पूर्ण औरत हूँ
क्या हूँ मैं ये ख़ुद को भी नहीं पता, 
शायद विधाता की एक भूल का नतीजा हूँ मैं 
समाज हमे ठुकराता है, घृणा करता है, 
और बनाने वाले ने कभी अपनाया नहीं, 
हम वो हैं, जो होकर भी कहीं नहीं है ं
हमारा होना शर्मसार करता है लोगों को, 
बचपन तो फिर भी कट जाता है अपना,
पर जवानी हमे जीने नहीं देती,
पुरुष का तन हमे आकर्षित करता है,
दिल हमारा उनकी ओर खींचता है, 
पर ऊपर वाले ने हमारे लिए 
नहीं बनाया है किसी को इस संसार में,
हमारी दुआएं सबके मन को भाये,
पर हम सबको कोई भी ना अपनाए,
हम रोते हैं चिल्लाते हैं पर हमारी चीख़
खो जाती है कहीं इस विशाल संसार के
अंधकार और क्षुद्रता से भरे सोच के भंवर में, 
घुट जाती है हमारी आवाज़ हमारे ही अंदर...
बस एक टीस सी दिल में हर वक़्त चुभती है, 
क्या हमारा अधूरा होना कोई अभिशाप है...!


#SwetaBarnwal 

2 comments:

Praveen kumar said...

बहुत ही मार्मिक सत्य है ये कि कैसे ईश्वर की ही एक रचना उपेक्षित है समाज मे


ये उपरवाला भी ना जाने क्या क्या रंग दिखाता है
किसी को बहुत खुशियां देता है किसी को बहुत रूलाता है

Unknown said...

Nice line

ऐ विधाता...!

 ऐ विधाता...! ना जाने तू कैसे खेल खिलाता है...  किसी पे अपना सारा प्यार लुटाते हो, और किसी को जीवन भर तरसाते हो,  कोई लाखों की किस्मत का माल...