नहीं हूँ मैं अच्छी लड़की
नहीं हूँ मैं अच्छी लड़की...
मैं लड़कों के साथ खेलती हूँ,
लड़कों के जैसे कपड़े भी पहनती हूँ,
जोर-ज़ोर से हँसती हूँ मैं
चिल्ला कर बोलती भी हूँ मैं
इसलिए तो नहीं हूँ मैं अच्छी लड़की...
मैं घूँघट भी नहीं करती,
नाहीं मैं चुप्पी ओढ़ती हूँ,
हर बात पे दुनिया से सवाल करती हूँ
यदा कदा तुमसे बराबरी भी करती हूँ,
इसलिए तो नहीं हूँ मैं अच्छी लड़की...
मेरी कई लड़कों से दोस्ती है,
कुछ अलग ही अपनी हस्ती है,
अपने अंदाज़ से ज़िन्दगी जीती हूँ
बिना पूछे अपनी राय भी देती हूँ,
इसलिए तो नहीं हूँ मैं अच्छी लड़की...
मेरी कई लड़कों से दोस्ती है,
कुछ अलग ही अपनी हस्ती है,
अपने अंदाज़ से ज़िन्दगी जीती हूँ
बिना पूछे अपनी राय भी देती हूँ,
इसलिए तो नहीं हूँ मैं अच्छी लड़की...
मेरे भी कुछ सपने कुछ अरमान हैं,
मैं भी आगे बढ़ना चाहती हूँ
आसमान को छूना चाहती हूँ,
मैं लड़ती हूँ समाज से अपने हक़ के लिए,
इसलिए तो नहीं हूँ मैं अच्छी लड़की...
मैं किसी भी अन्याय के विरुद्ध
खुलकर आवाज उठाती हूँ,
बात नारी के अस्मिता की हो गर तो
मैं सहन नहीं कर पाती हूँ,
इसलिए तो नहीं हूँ मैं अच्छी लड़की...
ग़लत इरादे से उठने वाले हाथों को तोड़ती हूँ मैं,
छिछोरी नज़रों को फोड़ती हुँ मैं,
मैं ख़ामोशी से सब कुछ नहीं सहती हूँ
मैं खुद की क्षमता को पहचानती हूँ
इसलिए तो नहीं हूँ मैं अच्छी लड़की...
हाँ बस इसलिए तो नहीं हूँ मैं अच्छी लड़की...
1 comment:
सभी एक सा नही सोंचते! बेटियों को मार्शल आर्ट और उच्च शिक्षा को प्रेरित करते लोग भी हैं, क्रिकेट और बॉक्सिंग को प्रेरक उपदेशक भी हैं। इस सोंच को वक्त की आहट मान स्वागतातुर लोग भी हैं।
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