Sunday, 16 September 2018

स्त्री का वजूद...

मेरी ख़ामोशी को मेरी कमजोरी समझते हो,
जो मैं बोल दूँ तो सुई सी तुम्हें चुभ जाती है,
क्यूँ मेरे सवालों से खीज होती है तुम्हें,
उठ जाए जो सर हमारा तो तुम्हारी तौहीन हो जाती है,
जो मैं बोल दूँ तो सुई सी तुम्हें चुभ जाती है,

शर्म-ओ-हया ही हम औरतों का गहना है,
हर अत्याचार हमे यूँ ही चुप चाप सहना है,
हर खोखले रीति रिवाजों को हमे ही ढोना है,
हमारे अस्तित्व पर हर बार ये सवाल छोड़ जाती है, 
जो मैं कुछ बोल दूँ तो सुई सी तुम्हें चुभ जाती है,

नारी देवी तुल्य है, ये दुनिया को सीखलाते हो, 
पत्थर की देवी के सामने श्रद्धा से सर झुकाते हो, 
"नारी तू नारायणी" के स्वर हमेशा गाते हो, 
हमे हर अधिकार से महरूम कर जाते हो,
जो मैं कुछ बोल दूँ तो सुई सी तुम्हें चुभ जाती है,..

हर बात पर हमारे चरित्र पे उंगली उठाते हो, 
कभी हमारे कपड़ों पे तो कभी हमारी आज़ादी पे 
कभी हमारे स्वाभिमान पे तो कभी हमारी आत्मनिर्भरता पे 
ना जाने कैसे कैसे तुम सवाल उठाते हो,
जो मैं कुछ बोल दूँ तो सुई सी तुम्हें चुभ जाती है,..

तुम्हारी दुनिया, तुम्हारी अदाकारी, तुम्हारे नियम, तुम्हारे कानून, 
हम कौन हैं...? 
हमारा अस्तित्व क्यूँ सिर्फ़ तुम्हारे बिस्तर तक ही सीमित होता है, 
क्यूँ हमारा वजूद तुम से शुरू हो कर तुमपे ही ख़त्म हो जाता है,
हमे ही क्यूँ सबकुछ सहना सिखाया जाता है, 
जो मैं कुछ बोल दूँ तो सुई सी तुम्हें चुभ जाती है,..

नौ महीने कोख में बच्चे को हम रखते हैं और नाम तुम्हारा होता है, 
क्यूँ मर्दों की इस दुनिया में हमारी कोई पहचान नहीं होती है,
क्यूँ हमारी आवाज़ को हमारे गले में ही दफ़न किया जाता है,
अब और सहन ना होगा हमसे, अब ये ख़ामोशी टूटेगी,
हम नारी जब ख़ुद पे आ जाएं तो काली बन काल पे टूटेगी...

#SwetaBarnwal

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