जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
करेगी वीरों की जयकार
लिखूंगी आज कुछ ऐसा
जगा दे जोश रग रग में
बहा दे देश प्रेम की गंगा
जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
सच को सच लिखूंगी आज
कहूँगी झूठ को मैं झूठ
घोर अंधेरों में उम्मीदों की
आशाएँ नई मैं खोलूंगी
जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
मेरी कलम नहीं छोड़ेगी
हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई
मेरी कलम आज लिखेगी
मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारा
देशभक्तों की ढाल बनेगी
और गद्दारों पर वार करेगी
जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
देश रक्षा की ख़ातिर मैं
यलगार लिखा करती हूँ
ऐसी हालत देख देश की
सारी रात जगा करती हूँ
जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
नींद नहीं आती है मुझको
मैं दिन रात ये सोचा करती हूँ
पड़ी जरूरत देश को तो मैं
कलम छोड़ तलवार उठा सकती हूँ
जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
भगा सकूँ दुख दर्द देश का
मैं बातों में ललकार भरा करती हूँ
शब्दों से कोई छेड़छाड़ नहीं
मैं उसमें आग भरा करती हूँ
जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
अपनी बातों से फूल नहीं
मैं बम और गोले दागा करती हूँ
कलम की ताकत से इस देश की
मैं तख्तो ताज़ पलट सकती हूँ
जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
सेंक रहे जो राजनीति की रोटियां
उन्हें सिखा दे सबक कुछ ऐसा
भुला कर हर भेद दिल से
करे वो सच्चा प्रेम देश से
जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
बड़ी गज़ब की ताकत है
इस कलम मे
ये रंक को राजा और
राजा को रंक बना सकती है
इसी कलम की ताकत से
गीता और पुराण हैं
इसी कलम ने दिया जहां मे
ज्ञान और विज्ञान है
इसी कलम से आज मैं
अंतर्मन का द्वंद लिखूंगी
वीरों की हुंकार लिखूंगी
तलवारों की झंकार लिखूंगी
गीत ग़ज़ल नव छन्द लिखूंगी
मातृभूमि का प्यार लिखूंगी
शहीदों का बलिदान लिखूंगी
जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
माँ सरस्वती की संतान
मातृभूमि की सेवक मैं
अपना तन मन और सर्वस्व
इस मिट्टी पे कर दूँ अर्पण
मेरी कविता का हर शब्द
कण कण मे क्रांति घोल रहा
देश का बच्चा बच्चा आज
जय हिंद जय हिंद बोल रहा
जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
#SwetaBarnwal
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
करेगी वीरों की जयकार
लिखूंगी आज कुछ ऐसा
जगा दे जोश रग रग में
बहा दे देश प्रेम की गंगा
जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
सच को सच लिखूंगी आज
कहूँगी झूठ को मैं झूठ
घोर अंधेरों में उम्मीदों की
आशाएँ नई मैं खोलूंगी
जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
मेरी कलम नहीं छोड़ेगी
हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई
मेरी कलम आज लिखेगी
मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारा
देशभक्तों की ढाल बनेगी
और गद्दारों पर वार करेगी
जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
देश रक्षा की ख़ातिर मैं
यलगार लिखा करती हूँ
ऐसी हालत देख देश की
सारी रात जगा करती हूँ
जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
नींद नहीं आती है मुझको
मैं दिन रात ये सोचा करती हूँ
पड़ी जरूरत देश को तो मैं
कलम छोड़ तलवार उठा सकती हूँ
जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
भगा सकूँ दुख दर्द देश का
मैं बातों में ललकार भरा करती हूँ
शब्दों से कोई छेड़छाड़ नहीं
मैं उसमें आग भरा करती हूँ
जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
अपनी बातों से फूल नहीं
मैं बम और गोले दागा करती हूँ
कलम की ताकत से इस देश की
मैं तख्तो ताज़ पलट सकती हूँ
जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
सेंक रहे जो राजनीति की रोटियां
उन्हें सिखा दे सबक कुछ ऐसा
भुला कर हर भेद दिल से
करे वो सच्चा प्रेम देश से
जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
बड़ी गज़ब की ताकत है
इस कलम मे
ये रंक को राजा और
राजा को रंक बना सकती है
इसी कलम की ताकत से
गीता और पुराण हैं
इसी कलम ने दिया जहां मे
ज्ञान और विज्ञान है
इसी कलम से आज मैं
अंतर्मन का द्वंद लिखूंगी
वीरों की हुंकार लिखूंगी
तलवारों की झंकार लिखूंगी
गीत ग़ज़ल नव छन्द लिखूंगी
मातृभूमि का प्यार लिखूंगी
शहीदों का बलिदान लिखूंगी
जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
माँ सरस्वती की संतान
मातृभूमि की सेवक मैं
अपना तन मन और सर्वस्व
इस मिट्टी पे कर दूँ अर्पण
मेरी कविता का हर शब्द
कण कण मे क्रांति घोल रहा
देश का बच्चा बच्चा आज
जय हिंद जय हिंद बोल रहा
जो मेरी कलम उठेगी
आज़ादी की हुंकार भरेगी...
#SwetaBarnwal
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