Friday, 3 May 2019

ना जाने क्यूँ....!

ना जाने क्यूँ अब
ज़िन्दगी मे वो बात नहीं है...

ना किसी रिश्ते मे प्यार और विश्वास ज़िंदा है
और ना ही अपनेपन का अहसास बाकी है
कभी बुजुर्गों के आशीर्वाद मे बरकत हुआ करती थी
अब तो माँ बाप भी बोझ बन कर रह गए हैं
कभी यारों से बता दिया करते थे हर बात दिल की
ना जाने क्यूँ अब यारों की यारी मे वो बात नहीं है

ना जाने क्यूँ अब
ज़िन्दगी मे वो बात नहीं है...

बिंदास मस्त मौला सी हुआ करती थी ज़िन्दगी अपनी
चेहरे के उपर किसी के कोई दूसरा चेहरा नहीं होता था
खुली किताब हुआ करती थी अपनी ज़िन्दगी
पड़ोसियों के भी खुशी और गम में शरीक हुआ करते थे
आज इंटरनेट के जरिए पूरी दुनिया से जुड़ गए हैं हम
पर जरूरत पड़ने पर कोई भी अपने साथ नहीं है

ना जाने क्यूँ अब
ज़िन्दगी मे वो बात नहीं है...

बहन भाई मे दुलार बहुत होता था
माँ बाप के चरणों में स्वर्ग हुआ करता था
होठ हिले बिना हाल बयां हुआ करता था
पल मे हर समस्या का समाधान हुआ करता था
ना जाने क्यूँ अब वो एहसास नहीं है
ना जाने क्यूँ साथ हो कर भी हम पास नहीं है

ना जाने क्यूँ अब
ज़िन्दगी मे वो बात नहीं है...

भावनायें दफ़न हो चुकी है दिलों में
इंसान बहुत ज्यादा व्यवहारिक हो गया है
धमनियों में लहू की जगह पानी बहने लगा है
सारे रिश्ते अब बेमानी हो चुके हैं
मशीन बन गए हैं हम सारे खो गई है इंसानियत
ना जाने क्यूँ अब हर रिश्ते में वो प्यार नहीं है

ना जाने क्यूँ अब
ज़िन्दगी मे वो बात नहीं है...

संयुक्त परिवार का दमन हो चुका है
एकल परिवार ने लोगों को स्वार्थी बना दिया है
घर में बुजुर्गों की जगह आया ने ले ली है
और पश्चिमी सभ्यता ने वृद्धाश्रम को पनपाया है
दादी नानी की कहानियां बस कहानी बन कर रह गई
ना जाने क्यूँ अब रिश्तों में वो मिठास नहीं है

ना जाने क्यूँ अब
ज़िन्दगी मे वो बात नहीं है...



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