माँ बस एक शब्द नहीं है
दुनिया का ये सार है
इसके आँचल मे छुपा
ये सारा संसार है
इस जहाँ या उस जहांँ
अंतहीन विस्तार है माँ
उसकी लोरी मे छुपा
जहां का असीमित प्यार है
बच्चे को हर तकलीफ़ से
बचा ले वो दीवार है माँ
ऐसा कोई है ना होगा
कोमल मधुर एहसास है माँ,
जितना छोटा शब्द है माँ,
उतना ही विस्तृत प्यार है माँ,
रख नौ महीने कोख में सन्तान को,
लहू से अपने सिंचती है माँ,
अपने सन्तान के जीवन के ख़ातिर,
विधाता से भी लड़ जाए माँ,
हर रिश्ते से अनोखा जग में,
ब्रह्मा का अनुपम वरदान है माँ,
माँ के होठों पर कभी बद्दुआ नहीं होती,
क्यूंकि माँ कभी ख़फ़ा नहीं होती,
उसकी दुआओं में है कुदरत की मेहर,
जो पा ले उसपे टूटे ना कोई कहर,
जब कभी गुस्सा होती है माँ,
आसुओं में अपने दर्द पिरोती है माँ,
भूल कर अपनी सारे ग़म ओ ख़ुशी,
संतान के लिए सुनहरे भविष्य संजोती है माँ,
माँ बस एक लफ्ज़ नहीं
जननी है वो इस जगत की
कूदरत भी तरसे पाने को जिसकी गोद,
ऐसा वो असीमित संसार है माँ,
बंशी की मीठी तान है माँ
लहरों की झंकार है माँ
काली भी है शेरावाली भी है
स्वयं दुर्गा का अवतार है माँ,
ममता और दया की मूर्ति है
विधाता का अनोखा वरदान है माँ,
उसके बिना सृष्टि का आधार नहीं,
धरा पर उस विधाता का अवतार है माँ,
ब्रह्मा भी वो और विष्णु भी वो
स्वयं महाकाल का स्वरुप है माँ,
पड़े जो विपदा संतान पर कभी
स्वयं काल से भी लड़ जाये माँ...
#SwetaBarnwal
दुनिया का ये सार है
इसके आँचल मे छुपा
ये सारा संसार है
इस जहाँ या उस जहांँ
अंतहीन विस्तार है माँ
उसकी लोरी मे छुपा
जहां का असीमित प्यार है
बच्चे को हर तकलीफ़ से
बचा ले वो दीवार है माँ
ऐसा कोई है ना होगा
कोमल मधुर एहसास है माँ,
जितना छोटा शब्द है माँ,
उतना ही विस्तृत प्यार है माँ,
रख नौ महीने कोख में सन्तान को,
लहू से अपने सिंचती है माँ,
अपने सन्तान के जीवन के ख़ातिर,
विधाता से भी लड़ जाए माँ,
हर रिश्ते से अनोखा जग में,
ब्रह्मा का अनुपम वरदान है माँ,
माँ के होठों पर कभी बद्दुआ नहीं होती,
क्यूंकि माँ कभी ख़फ़ा नहीं होती,
उसकी दुआओं में है कुदरत की मेहर,
जो पा ले उसपे टूटे ना कोई कहर,
जब कभी गुस्सा होती है माँ,
आसुओं में अपने दर्द पिरोती है माँ,
भूल कर अपनी सारे ग़म ओ ख़ुशी,
संतान के लिए सुनहरे भविष्य संजोती है माँ,
माँ बस एक लफ्ज़ नहीं
जननी है वो इस जगत की
कूदरत भी तरसे पाने को जिसकी गोद,
ऐसा वो असीमित संसार है माँ,
बंशी की मीठी तान है माँ
लहरों की झंकार है माँ
काली भी है शेरावाली भी है
स्वयं दुर्गा का अवतार है माँ,
ममता और दया की मूर्ति है
विधाता का अनोखा वरदान है माँ,
उसके बिना सृष्टि का आधार नहीं,
धरा पर उस विधाता का अवतार है माँ,
ब्रह्मा भी वो और विष्णु भी वो
स्वयं महाकाल का स्वरुप है माँ,
पड़े जो विपदा संतान पर कभी
स्वयं काल से भी लड़ जाये माँ...
#SwetaBarnwal
1 comment:
बहुत ही बेहतरीन सादगी और सच्चाई से ओत प्रोत कविता...
यूँ तो शब्दों से परे है माँ.
उनको शब्दों में पिरोना, जैसे सूरज को दीपक दिखाना.
बहुत ही अच्छी और सराहनीय प्रयास...
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