Wednesday, 29 May 2019

माँ..! बेटी हूँ मैं तेरी, बेटी होने की कब तक सज़ा पाऊँ मैं...

जब से जन्म लिया मैंने
पराया धन होने का दंश मिला
नही बढ़ा सकती मैं कुल को
इसका ही बस तंज मिला

माँ..! बेटी हूँ मैं तेरी
बेटी होने की कब तक सज़ा पाऊँ मैं...

इसको ही मान कर अपनी किस्मत
सबके हर फैसले के सामने सर झुकाया मैंने
हाथों की लकीरों को बस
यूँ ही हर पल झुठलाया मैंने

माँ..! बेटी हूँ मैं तेरी
बेटी होने की कब तक सज़ा पाऊँ मैं...

ना शिक्षा का अधिकार मिला
ना ही बेटों जैसा प्यार मिला
ना जीने का अधिकार मिला
ना ही मेरे सपनों को परवान मिला

माँ..! बेटी हूँ मैं तेरी
बेटी होने की कब तक सज़ा पाऊँ मैं...

ना तेरी कोख में मैं सुरक्षित हूँ
ना तेरे आँचल की मुझको छाँव मिली
ना दुनिया ने ही मुझको अपनाया
ना जालिम नज़रों से मैं बच पाई

माँ..! बेटी हूँ मैं तेरी
बेटी होने की कब तक सज़ा पाऊँ मैं...

उठी जो एक दिन डोली मेरी
उठी अर्थी अरमानों की
हर पल रंग बदलती दुनिया में
किस किस से ख़ुद को बचाऊँ मैं

माँ..! बेटी हूँ मैं तेरी
बेटी होने की कब तक सज़ा पाऊँ मैं...

कब तक अश्क बहाऊं मैं
आख़र किस ग़लती की सज़ा पाऊं मैं
इन मतलबी रिश्तों का हाथ थामे
आख़िर कितनी दूर जाऊं मैं

माँ..! बेटी हूँ मैं तेरी
बेटी होने की कब तक सज़ा पाऊँ मैं...

चूर हो गए हैं सारे ख्वाब मेरे
आख़िर किसको ये बतलाऊं मैं
ओछी नज़रों से देखते हैं जो मुझको
कैसे ख़ुद को उनसे अब बचाऊँ मैं

माँ..! बेटी हूँ मैं तेरी
बेटी होने की कब तक सज़ा पाऊँ मैं...

आँखें बन्द कर देखते हैं सब मेरे जज़्बातों को
कहाँ से उनमें इंसानियत लाऊं मैं
जो सिर्फ़ नारी देह समझते हैं मुझको
कहाँ से उनके दिल में प्यार जगाउं मैं

माँ..! बेटी हूँ मैं तेरी
बेटी होने की कब तक सज़ा पाऊँ मैं...

इन पथराई हुई आँखों से
देखती रहती हूँ मैं हर पल चहूं ओर
कोई तो ऐसा होगा इस जहाँ में
जो बढ़ाएगा प्यार से हाथ हमारी ओर

माँ..! बेटी हूँ मैं तेरी
बेटी होने की कब तक सज़ा पाऊँ मैं...

पराई थी पराई हूँ मैं
इस बात को ख़ुद से कैसे छुपाऊँ मैं
माँ..! बेटी हूँ मैं तेरी
बेटी होने की कब तक सज़ा पाऊँ मैं...


#SwetaBarnwal



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