Friday, 6 April 2018

ये उम्र.... चालीस पार की...

बड़ी अल्हड़ सी हो जाती है ये उम्र.... चालीस पार की... 

कभी करता है नादानीयां, कभी चाहता है मनमर्जीयां,
कभी चुपचाप खामोश तो कभी लुटाता है ढेरों खुशियां, 
कभी हसीनाओं पे दिल अटकता है तो करता है शोखियाँ, 
कभी बच्चे सा दिल हो जाता है और कर जाता है गुस्ताखियां...

बड़ी अल्हड़ सी हो जाती है ये उम्र.... चालीस पार की...

कभी मस्तमौला हो उड़ता रहता है सपनों के वन में,
कभी इस फूल तो कभी उस कली को चूमता है मन में, 
कभी खिलखिलाता है तो कभी आँसू बहाता है अकेले में, 
कभी-कभी खुद को बहुत ही तन्हा पाता है दुनिया की भीड़ में... 

बड़ी अल्हड़ सी हो जाती है ये उम्र.... चालीस पार की... 

कभी मचलता है, कभी फिसलता है, 
कभी पिघलता है, कभी सम्भलता है,
रौशन हवाएं हो उठती है, ज़िंदगी को रंगीन कर जाता है,
कभी करता है गुस्ताख़ियाँ, कभी गुमनाम हो जाता है, 
कभी करता है शरारत तो बिखेरता है शोखियाँ, 

बड़ी अल्हड सी हो जाती है ये उम्र... चालीस पार की... 

#SwetaBarnwal 

4 comments:

Unknown said...

पूर्ण सत्य

Unknown said...

Wah ji wah... Maan gye Sweta ji aapko... Kya response diye he
Hasinao pr dil atkta he.... 😂😂😂

Unknown said...

😂😂😂😂

Anonymous said...

आ हा हा...
क्या सुन्दर अभिव्यक्ति है...
उम्र चालीस पार की...
अद्भुत...

ऐ विधाता...!

 ऐ विधाता...! ना जाने तू कैसे खेल खिलाता है...  किसी पे अपना सारा प्यार लुटाते हो, और किसी को जीवन भर तरसाते हो,  कोई लाखों की किस्मत का माल...