Saturday, 2 December 2017

मैं और मेरा बचपन...

जो छुट गया,  उसे पाने का मन है,
जो पाया है,  उसे भूल जाने का मन है।

छोड़ा बहुत कुछ,  पाया बहुत कम है,
खर्चा बहुत सारा,  जोड़ा बहुत कम है।

छोड़ा बहुत पीछे वो प्यारा छोटा-सा घर,
छोड़ा मां-बाबूजी के प्यारे सपनों का शहर।

छोड़े वो हमदम वो गली,  वो मोहल्ले,
छोड़े वो दोस्तों के संग विद्यालय की नौटंकी, वो हल्ले।

छोड़े सभी पड़ोस के वो प्यारे-से रिश्ते,
छुट गए प्यारे से वो सारे अध्यापक और बस्ते।

जो छोड़ा उसे पाने का मन है,
जो पाया है उसे भूल जाने का मन है।

छूटी वो प्यार वाली मीठी-सी राखी, होली और दिवाली,
छूटा वो विद्यालय, छूटी वो बिंदास दोस्तों की टोली।

छूटा वो गोलगप्पे वाला, वो अल्हड़पन, वो मस्ती,
छूटे वो बचपन के सब संगी और साथी।

छूटी वो मां के हाथ की प्यार भरी रोटी,
छूटी वो बहनों की प्यार भरी चिकोटी।

छूट गई नदिया, छूटे हरे-भरे खेत,
जिंदगी फिसल रही, जैसे मुट्ठी से रेत।

छूटे वो भाई-बहन, वो गुड्डे-गुड़ियों संग खेलना,
छुटी वो अटखेलियां, वो मासूमियत, वो नादानियां।

छूट गया #श्वेता का बचपन उस प्यारे से गांव में,
यादें शेष रह गईं बस सपनों के छांव में।

#SwetaBarnwal 

2 comments:

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